देश हित की बात — आपदा में प्रबंधन और सेवा-सहयोग : मधु भूतड़ा 'अक्षरा'
आपदा कभी चेतावनी देकर नहीं आती। भूकंप, बाढ़, भूस्खलन, चक्रवात, बादल फटना या किसी अन्य प्राकृतिक आपदा के सामने कुछ ही क्षणों में सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। ऐसे समय में सरकार की तैयारियों के साथ-साथ समाज की संवेदनशीलता, प्रशासन का समन्वय और नागरिकों की सेवा-भावना तीनों की परीक्षा होती है।
भारत की पहचान केवल एक बड़े देश के रूप में नहीं, बल्कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को व्यवहार में उतारने वाले राष्ट्र के रूप में भी रही है। जब किसी दूसरे देश पर संकट आता है, भारत की सहायता की भावना सीमाओं तक सीमित नहीं रहती।
अगस्त-सितंबर 2026 वर्तमान में नेपाल की भीषण बाढ़ के समय भी भारत ने मानवीय सहायता का हाथ बढ़ाते हुए राहत सामग्री, बचाव विशेषज्ञों और तकनीकी दलों को भेजकर पड़ोसी धर्म निभाया है।
25 अप्रैल 2015 को नेपाल में 7.8 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप आया। हजारों लोगों की जान गई और बड़ी संख्या में इमारतें तथा बुनियादी ढाँचा क्षतिग्रस्त हुआ। भारत ने बिना समय गंवाए “ऑपरेशन मैत्री” शुरू किया और राहत एवं बचाव दल नेपाल भेजे।
राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी NDRF की 16 विशेष खोज एवं बचाव की संवेदनशीलता का एक उल्लेखनीय उदाहरण यह भी रहा कि मलबे से मिले सोने के आभूषण और मुद्रा जैसी मूल्यवान वस्तुएँ सुरक्षित रखकर नेपाली अधिकारियों को सौंप दी गईं। आपदा के बीच भी ईमानदारी और मानवीय मूल्यों की यह मिसाल अपने आप में बहुत कुछ कहती है।
यह केवल पड़ोसी की सहायता नहीं थी, यह उस भारतीय संस्कार की अभिव्यक्ति थी, जिसमें संकट में पड़े व्यक्ति की सहायता करना अपना कर्तव्य माना जाता है।
भारत कभी भी आपदाओं में पीछे नहीं रहा, अनेकों देश इसको बखूबी जानते हैं। नेपाल, तुर्किये, सीरिया, श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश, फिजी, फिलीपींस, इंडोनेशिया, मोजाम्बिक, मालदीव, मॉरीशस, मेडागास्कर, पापुआ न्यू गिनी, कोमोरोस, सेशेल्स, कांगो गणराज्य, यमन, लीबिया, ग्वाटेमाला इत्यादि जैसे दूसरे देशों की सहायता करने वाला भारत अपने देशवासियों के संकट में भी लगातार मोर्चे पर खड़ा रहा है।
अपने देश में भी उत्तराखंड की त्रासदी, चेन्नई की बाढ़, केरल की बाढ़ और वायनाड के भूस्खलन जैसी अनेक आपदाओं में NDRF, सेना, वायुसेना, स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवी संगठनों ने मिलकर हजारों लोगों की जान बचाई और प्रभावित परिवारों तक राहत पहुँचाई।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि आधुनिक भारत में आपदा प्रबंधन केवल राहत सामग्री पहुँचाने तक सीमित नहीं रहा। आज हमारे पास प्रशिक्षित बचाव बल, विशेष उपकरण, मेडिकल सहायता, खोजी श्वान दस्ते, नावें, पर्वतीय बचाव क्षमता और आपदा के अनुरूप प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध हैं।
आपदा के समय स्थानीय प्रशासन, पुलिस, सेना, NDRF, SDRF, चिकित्सा दल, स्वयंसेवी संस्थाएँ, सामाजिक संगठन और सामान्य नागरिक सभी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
दवा, भोजन, सुरक्षित स्थान और जीवन के लिए सहायता, उनके परिजनों को ढूँढने में मदद करना मानवता का फर्ज भारत यूँ तो सदैव निभाता रहा है।
दुर्भाग्य से हर आपदा के समय लूटपाट, चोरी, जमाखोरी, राहत सामग्री की कालाबाजारी, फर्जी राहत माँग और अफवाह फैलाने जैसी घटनाएँ भी मानवता को शर्मसार कर देती हैं।
जिस समय किसी का घर उजड़ चुका हो, परिवार बिछड़ चुका हो और जीवन बचाने के लिए संघर्ष चल रहा हो, उस समय किसी की मजबूरी का लाभ उठाना केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवीयता के विरुद्ध घिनौना कृत्य है।
आपदा प्रबंधन अधिनियम में राहत के लिए रखी धनराशि या सामग्री के दुरुपयोग तथा फर्जी राहत दावों के लिए दंड का प्रावधान है। राहत कार्य में बाधा डालना और आपदा के संबंध में झूठी चेतावनी फैलाकर भय पैदा करना भी दंडनीय है।
बचाव दलों के काम में बाधा न डालें।
अनावश्यक भीड़ न लगाएँ।
अफवाहों को आगे न बढ़ाएँ।
राहत सामग्री केवल आवश्यकता के अनुसार लें।
जरूरतमंद, बुजुर्ग, बच्चे, दिव्यांग और अकेले रह गए लोगों को प्राथमिकता दें।
रक्तदान, भोजन, कपड़े और आवश्यक वस्तुओं का सहयोग अधिकृत संस्थाओं के माध्यम से करें।
और सबसे महत्वपूर्ण है कि किसी की मजबूरी को अपने लाभ का अवसर न बनाएँ।
आपदा में घर टूटते हैं, सड़कें और पुल भी, लेकिन उसी समय बनते हैं इंसानियत के पुल भी।
आपदा की घड़ी में प्रशासन की तत्परता, बचाव दलों की बहादुरी, सामाजिक संस्थाओं की सक्रियता और नागरिकों की संवेदनशीलता, जब एक साथ आती है, तभी आपदा प्रबंधन प्रभावी बनता है।
भारत ने संकट में अपने नागरिकों के साथ खड़े होकर और सीमाओं के पार भी सहायता का हाथ बढ़ाकर बार-बार यह सिद्ध किया है कि मानवता की कोई सीमा नहीं होती।
भूकंप हो, बाढ़, भूस्खलन या चक्रवात, कुछ ही क्षणों में जीवन की पूरी व्यवस्था बदल जाती है। ऐसे समय में प्रशासन की तत्परता के साथ समाज की संवेदनशीलता और नागरिकों का सहयोग सबसे बड़ी ताकत बनता है।
आपदा की घड़ी मानवता की भी परीक्षा होती है।
"आपदा में जो हाथ बढ़े
वही सच्चा सहयोग है
दुख में जो साथ खड़ा रहे
वही मानवता का योग है
टूटे घर फिर बन जाएँगे
मिट जाएँगे घाव
सेवा और संवेदना से ही
मजबूत होगा देश और समाज।"
संकट की घड़ी में भारत ताकत है।
देश हित की बात में अंत में यही याद रखना है कि किसी की पीड़ा में
हमारा छोटा-सा सहयोग भी
किसी के जीवन की बड़ी उम्मीद बन सकता है।
मधु भूतड़ा 'अक्षरा'
गुलाबी नगरी जयपुर से
(संपादिका, लेखिका, कवयित्री)
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मोबाइल - 9828153965

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