| माहेश्वरी समाज में रक्षाबंधन ऋषि पंचमी को ही क्यों? — परंपरा में छिपी हमारी पहचान : महावीर चांडक |
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भारत विविधताओं और परंपराओं का देश है। यहां प्रत्येक समाज, संप्रदाय और क्षेत्र की अपनी विशिष्ट धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराएं रही हैं। इन्हीं परंपराओं ने हमारी सामाजिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है। सामान्यतः रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, लेकिन माहेश्वरी समाज में रक्षाबंधन ऋषि पंचमी के दिन मनाने की परंपरा है। यह केवल तिथि का अंतर नहीं, बल्कि हमारी अपनी सांस्कृतिक विरासत और पहचान का प्रतीक है। माहेश्वरी समाज की मान्यता भगवान महेश अर्थात भगवान शिव से जुड़ी हुई है। समाज की परंपराओं में ऋषियों और गुरु परंपरा का विशेष स्थान रहा है। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति के समय समाज के मार्गदर्शक ऋषियों द्वारा रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा रही, इसलिए ऋषि पंचमी का दिन हमारे लिए रक्षाबंधन से विशेष रूप से जुड़ गया। इसी के साथ एक अन्य प्रचलित किंवदंती भगवान गणेश और उनकी बहन से भी जुड़ी है, जिसके अनुसार ऋषि पंचमी के दिन गणेशजी को उनकी बहन ने सर्वप्रथम राखी बांधी थी। इन कथाओं को हम इतिहास के कठोर प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही समाज की सांस्कृतिक स्मृति और आस्था के रूप में देखते हैं। यही स्मृतियां किसी समाज को केवल लोगों का समूह नहीं रहने देतीं, बल्कि उसे एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती हैं। रक्षाबंधन का मूल भाव तो भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और मंगलकामना से जुड़ा है, लेकिन माहेश्वरी परंपरा में इसका स्वरूप थोड़ा अलग भाव लिए हुए है। यहां राखी केवल भाई की कलाई पर बंधने वाला धागा नहीं है; यह अपने संस्कारों, अपनी परंपरा और अपने समाज से जुड़े रहने का सूत्र भी है। समय के साथ हमारी जीवनशैली बदली है। परिवार दूर-दूर बस गए हैं, नई पीढ़ी आधुनिक शिक्षा और आधुनिक जीवन-पद्धति के साथ आगे बढ़ रही है। यह परिवर्तन स्वाभाविक है और आवश्यक भी। लेकिन आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से दूरी बनाना नहीं हो सकता। जिस समाज ने अपनी पहचान सदियों की परंपराओं से बनाई है, उसके लिए अपनी विशिष्ट परंपराओं को जानना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना उतना ही आवश्यक है जितना आधुनिक समय के साथ आगे बढ़ना। आज जब चारों ओर एक ही दिन, एक ही तरीके और एक ही संस्कृति के प्रभाव में त्योहार मनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब ऋषि पंचमी पर रक्षाबंधन मनाना माहेश्वरी समाज की अपनी अलग पहचान को जीवित रखने का अवसर है। यह किसी अन्य परंपरा का विरोध नहीं, बल्कि अपनी परंपरा के प्रति सम्मान है। हमें यह भी समझना होगा कि परंपरा तभी जीवित रहती है जब उसके पीछे का भाव अगली पीढ़ी को समझाया जाए। यदि हम अपने बच्चों से केवल इतना कहेंगे कि “हम राखी पूर्णिमा को नहीं, ऋषि पंचमी को बांधते हैं”, तो शायद वह इसे केवल एक अलग तारीख समझेंगे। लेकिन जब हम उन्हें बताएंगे कि इसके पीछे हमारे समाज की अपनी मान्यता, गुरु परंपरा, भगवान महेश से जुड़ी सांस्कृतिक स्मृति और पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक विरासत है, तब उनके मन में इसके प्रति गर्व का भाव पैदा होगा। परंपराएं बोझ नहीं होतीं, वे हमारी पहचान की जड़ें होती हैं। जड़ों को संभालकर ही वृक्ष नई ऊंचाइयों तक पहुंचता है। इसी प्रकार समाज भी तभी मजबूत होता है जब आधुनिकता के साथ उसकी संस्कृति और संस्कार भी सुरक्षित रहें। इसलिए ऋषि पंचमी का रक्षाबंधन हमारे लिए केवल राखी बांधने का दिन नहीं है। यह वह अवसर है जब एक बहन अपने भाई की मंगलकामना करती है, परिवार एक साथ आता है और समाज अपनी उस विशिष्ट परंपरा को याद करता है जिसने उसे दूसरों से अलग पहचान दी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी परंपराओं को केवल निभाएं ही नहीं, उन्हें समझें, उनका सम्मान करें और अपनी आने वाली पीढ़ी को गर्व के साथ सौंपें। क्योंकि— राखी का धागा कलाई पर बंधता है, लेकिन परंपरा का धागा पीढ़ियों को जोड़ता है। और यही ऋषि पंचमी का रक्षाबंधन माहेश्वरी समाज के लिए केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान से जुड़ने का पावन अवसर है।
महावीर चांडक
सयुंक्त मंत्री पूर्वोत्तर माहेश्वरी सभा |