शरद पूर्णिमा
एकटक निहार रही हूँ चांद को
चुपके से ये मन छूना चाहता है
पूर्णिमा की इन धवल किरणों को
उजियारा करना बहुत भाता है।
झूमते-नाचते शाखों पर पत्ते
गुनगुनाती मुस्काती मंद हवाएं
आँगन में उतरी ओस की बूंदे 

सितारें नभ पर झिलमिलाएं।
शीतल चाँदनी कहे ठहर जा रे
इन लम्हों को तू जी ले भरपूर
बीत रही आपाधापी में जिंदगी
भर लें अपने भीतर सच्चा नूर।
सुई के छिद्र में धागा पिरोकर
धैर्य एकाग्र सामंजस्य सिखाता
सरगम छेड़े अंतर्मन के कोने
खीर अमृत मिठास सजाता।
बेला यह इतनी हो गई है मनोरम
कह रहा चाँद पूरे कर ले तू सपने
प्रेम समाया अंतरतम में इस कदर
नैना भी चल दिए आज बहकने।
खोकर सुध-बुध इस महारास में
आत्मा-परमात्मा मिलन हो जाए
श्वासों में घुले बंशी की मधुर धुन
निश्छल वीणा मृदु साज सुनाएं।

 मधु भूतड़ा 'अक्षरा'
गुलाबी नगरी जयपुर से
(संपादिका, लेखिका, कवयित्री)
मोबाइल - 9828153965
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M : +91 9828153965

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