डॉ. मदन गोपाल लढ़ा, श्रीमती बसंती चांडक साहित्य सम्मान से सम्मानित

श्रीमती बसंती चांडक साहित्य सम्मान समिति, अकोला की ओर से प्रतिवर्ष प्रदान किए जाने वाले प्रतिष्ठित गद्य साहित्य सम्मान से इस वर्ष चर्चित कवि, कहानीकार एवं आलोचक डॉ. मदन गोपाल लढ़ा को सम्मानित किया गया। उनके चर्चित कहानी संग्रह 'हरे रंग का मफलर' का चयन इस सम्मान के लिए किया गया।

सम्मान के लिए गठित निर्णायक मंडल ने गद्य श्रेणी में 'हरे रंग का मफलर' को श्रेष्ठ कृति मानते हुए इसका चयन किया। श्री माहेश्वरी समाज ट्रस्ट, अकोला की ओर से आयोजित सम्मान समारोह में डॉ. लढ़ा को प्रशस्ति पत्र एवं एक लाख रुपये की सम्मान राशि अर्पित की गई।

अकोला स्थित माहेश्वरी भवन सभागार में आयोजित समारोह के मुख्य अतिथि महासभा के मुखपत्र माहेश्वरी की संपादक सुमन मूंधड़ा एवं बसंती चांडक रिलीफ फाउंडेशन के ट्रस्टी श्यामसुंदर चांडक थे। इस अवसर पर विदर्भ प्रादेशिक माहेश्वरी सभा के अध्यक्ष रमन हेड़ा सहित समाज के अनेक गणमान्यजन एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

समारोह में कविता श्रेणी का श्रीमती बसंती चांडक साहित्य सम्मान बालोतरा की स्वाति मानधना को प्रदान किया गया। ग्राम महाजन, जिला बीकानेर में जन्मे डॉ. मदन गोपाल लढ़ा हिंदी एवं राजस्थानी साहित्य में समान रूप से सक्रिय चर्चित कवि, कहानीकार एवं आलोचक हैं। उन्हें साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उनकी अब तक डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

डॉ. लढ़ा ने राजस्थानी एवं गुजराती भाषा की अनेक महत्वपूर्ण रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया है। उनकी चर्चित कृतियों में 'होना चाहता हूं जल', 'हरे रंग का मफलर', 'चीकणा दिन', 'बीज', 'बूंटो अर चियां' तथा 'ग्रह गोचर' प्रमुख हैं।

डॉ. लढ़ा को प्रतिष्ठित साहित्य सम्मान मिलने पर साहित्य जगत एवं माहेश्वरी समाज में हर्ष की लहर है। उनके साहित्यिक योगदान को यह सम्मान एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

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