| मैं आज़ाद भारत की नागरिक हूँ... मैं भारत के कसीदे पढ़ना चाहती हूँ - मधु भूतड़ा 'अक्षरा' |
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मैं आज़ाद भारत की नागरिक हूँ, जिसकी मिट्टी को माथे से लगाना मेरे लिए गर्व है और जिसकी हवाओं में मुझे अपने पुरखों के त्याग, धैर्य, तप की सुगंध आती है। मैं उस भारत की बेटी हूँ, जहाँ की मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, मातृभूमि का स्पंदन है, नदियों की कलकल है, वह मात्र जलधाराएँ नहीं, जीवन की अविरल गाथाएं हैं, जहां के पर्वत केवल शिलाएँ नहीं, संकल्प और सुरक्षा के पहरेदार हैं और खेत धरती के टुकड़े नहीं, अन्नदाता के परिश्रम का उपहार हैं। मैं अपने भारत के कसीदे पढ़ना चाहती हूँ, मैं गर्व से कहना चाहती हूँ कि मेरा भारत केवल एक इतिहास या भूगोल नहीं, हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान और जीवन-दर्शन का विराट स्वरूप है। यह वही धरती है जहाँ वेदों की ऋचाएँ गूँजी है, उपनिषदों ने जीवन के गूढ़ प्रश्नों पर विचार किया और योग ने मनुष्य को स्वयं से जुड़ने का मार्ग दिखाया, जहाँ बुद्ध की करुणा ने संसार को शांति का संदेश दिया, महावीर ने अहिंसा का प्रकाश फैलाया और अनेक संतों ने प्रेम, समता तथा मानवता को जीवन का आधार बनाया। मेरे भारत की पहचान उसकी विविधता में बसती है, जहां भाषाएँ, बोलियाँ, वेश अनेक, पर मन है एक। कहीं मंदिर की घंटियाँ हैं, कहीं मस्जिद की अज़ान, कहीं गुरुद्वारे की गुरुवाणी, कहीं गिरजाघर की प्रार्थना और इन सबके बीच धड़कता और चहकता है भारत का विशाल हृदय। मैं भारत के कसीदे पढ़ना चाहती हूँ, जहाँ त्यौहार कैलेंडर में लिखे जाते हैं, रिश्तों में रंग भरे जाते हैं, हर राज्य में उत्सव धूमधाम से मनाए जाते हैं। दीपावली का दीप अँधेरे को चुनौती देता है, होली मन के भेद मिटाती है, ईद अपनत्व का संदेश देती है, गुरुपर्व सेवा का भाव जगाता है और क्रिसमस प्रेम की मधुरता बाँटता है। मैं भारत की मिट्टी की खुशबू महसूस करना चाहती हूँ, सावन की पहली फुहार में, मेघों की बौछार में, शिव के ओंकार में, खेतों की मेड़ों पर, गाँव की पगडंडियों में, चूल्हे की सौंधी आँच में और उस किसान की हथेली में, जिसने अपने श्रम से धरती को अन्नपूर्णा बना दिया। मैं भारत के कसीदे पढ़ना चाहती हूँ, जहां हिमालय की ऊँचाई देखती हूँ, गंगा की पवित्र धारा सुनती हूँ, राजस्थान की स्वर्णिम धोरों को चमचमाते हुए महसूस करती हूँ, दक्षिण के मंदिरों की स्थापत्य-कला निहारती हूँ और समुद्र की लहरों में उसकी अनंतता और विशालता को अंगड़ाई लेते हुए पाती हूँ। मेरा भारत केवल अतीत पर गर्व करने वाला भारत नहीं है, यह चांद तक पहुँचने का साहस रखता है, विज्ञान और तकनीक में नई ऊँचाइयाँ छूने की कोशिश में बढ़ता है, खेत से अंतरिक्ष तक अपनी प्रतिभा का परिचय देता है, क्योंकि यह हमारा नया भारत है। यहाँ सैनिक सीमा पर रक्षक बनकर खड़ा है, किसान खेत में पसीना बहाता है, वैज्ञानिक प्रयोगशाला में भविष्य गढ़ता है, शिक्षक नई पीढ़ी को दिशा देता है और श्रमिक अपने श्रम से राष्ट्र की आधारशिला मजबूत करता है। मैं उस भारत की नागरिक हूँ जिसने स्वतंत्रता की कीमत अपने वीरों के बलिदान से चुकाई है, इसलिए जब तिरंगा आकाश में लहराता है, तो मुझे उसमें केवल तीन रंग नहीं दिखाई देते-मुझे उसमें असंख्य बलिदानों की कहानी, करोड़ों सपनों की उड़ान और स्वतंत्र भारत की गौरवगाथा दिखाई देती है। हाँ, मेरे भारत में अनगिनत चुनौतियाँ हैं और ढेरों कमियाँ भी हैं, लेकिन मेरा विश्वास है कि जिस राष्ट्र में अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें बदलने का साहस हो, वही राष्ट्र निरंतर आगे बढ़ता है। मेरे भारत ने इसे सिद्ध किया है। मैं अपने भारत की प्रशंसा में अक्षरों के दीप जलाना चाहती हूँ, इस पावन धरती को नमन करना चाहती हूँ, उसकी झील , झरने, नदियों के कलकल में अपना स्वर मिलाना चाहती हूँ, उसकी पुरवाई में साँस लेकर बस यही कहना चाहती हूँ कि... यह मेरा भारत है मेरी पहचान है मेरी जन्मभूमि है मेरी कर्मभूमि है मेरा स्वाभिमान है। और जब कोई मुझसे पूछता है कि “तुम्हें अपने भारत में सबसे अच्छा क्या लगता है?” तो मैं यही कहती हूँ - “मुझे अपने भारत का वह स्वरूप सबसे अच्छा लगता है,जो विविधताओं को समेटकर भी एकता रखता है।” मैं आज़ाद भारत की नागरिक हूँ और मुझे गर्व है कि मेरी साँसों में इस देश की महक है, मेरे रोम-रोम में इसकी झलक है, मेरे हृदय में तिरंगे की आन-बान-शान है, मेरा भारत मेरे लिए केवल सबसे अच्छा देश नहीं, बल्कि मेरे अस्तित्व की सबसे सुंदर पहचान है। "जब तक मेरी साँस चलती रहेगी, तब तक मैं अपने भारत का कसीदा पढ़ती रहूँगी, क्योंकि.... मेरा भारत महान!" जय हिंद! जय भारत!
मधु भूतड़ा 'अक्षरा'
गुलाबी नगरी जयपुर से (संपादिका, लेखिका, कवयित्री) मोबाइल -9828153965 #ekpehal #ekpehalbymadhubhutra |