पेड़ सिर्फ लगाना नहीं, पालना है जरूरी - मधु भूतड़ा 'अक्षरा'
पर्यावरण दिवस 5 जून है, तो मैंने सोचा कि क्यों न इस पर शोध किया जाए। सबसे पहले यह पाया कि काफी अरसे से भारत देश में एक अभियान चल रहा है...
"एक पेड़ माँ के नाम"
इसके तहत पूरे विश्व में पेड़ लगाए जाते हैं। विशेष रूप से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा इटली, इथोपिया, यूके, त्रिनिदाद, मॉरिशस, टोबैगो आदि अनेक देशों में वृक्षारोपण किया गया है। इसी प्रकार अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भी भारत आकर वृक्ष लगाए हैं। ऐसे उच्च स्तर पर लगाए गए पेड़ों की देखभाल भी अच्छी प्रकार से होती है, इसलिए वे पेड़ पनपते हैं, फूलते-फलते हैं और प्रकृति को मुस्कुराहट देते हैं।
यही सिलसिला अनवरत चल रहा है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा पिछले वर्ष 50 करोड़ पौधे रोपण के लिए तैयार किए गए। यह कोई छोटा नहीं, बल्कि बहुत बड़ा आँकड़ा है। हरियाली बढ़ाने के इस अभियान में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जी द्वारा जयपुर जिले में 66 लाख, उदयपुर जिले में 33 लाख और जैसलमेर जिले में 32 लाख पौधे रोपित किए गए। यह जानकारी उनकी सोशल मीडिया साइट से प्राप्त होती है।
पेड़ लगाना निस्संदेह बहुत अच्छी बात है, लेकिन उनकी देखभाल करना उससे भी अधिक आवश्यक है। कई बार बड़ी संख्या में पौधे लगा दिए जाते हैं, परंतु पानी, सुरक्षा और देखरेख की उचित व्यवस्था नहीं होने से वे सूख जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं।
सिर्फ पेड़ लगाने के आँकड़े दिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि कितने पेड़ जीवित हैं और सही तरीके से बढ़ रहे हैं। पर्यावरण बचाने का सही प्रयास तभी माना जाएगा, जब लगाए गए पेड़ों की जिम्मेदारी भी पूरी ईमानदारी से निभाई जाए।
केदारनाथ सिंह जी की ये पंक्तियाँ अत्यंत मार्मिक हैं—
"हरा पत्ता कभी मत तोड़ना,
और अगर तोड़ना भी पड़े,
तो पेड़ को न हो पीड़ा।
रात को जब भी रोटी तोड़ना,
तो पहले सिर झुका कर गेहूँ के पौधे याद कर लेना।"
भीषण गर्मी में झुलसती धरती को पेड़ों की जरूरत है और इंसानों को छाँव की।
एक पेड़ कटता है तो पंछियों का आशियाना उजड़ जाता है। गौरैया, गिलहरियाँ और मधुमक्खियाँ बिछुड़ जाती हैं। प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। धरती पर ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है तथा फल-फूल, अन्न, औषधि और वर्षा में कमी आने लगती है। ऐसे में सैकड़ों पेड़ों का मरना और कटना अत्यंत पीड़ादायक है।
एक तथ्य यह भी है कि यदि इंसान को कृत्रिम रूप से ऑक्सीजन बनानी पड़े, तो केवल छह महीने में इसकी लागत अकल्पनीय होगी, जबकि पेड़ यह कार्य निःशुल्क करते हैं। इसीलिए पेड़ों की रक्षा अत्यंत आवश्यक है।
विकास, प्रगति और विज्ञान ने मानव जीवन को सुविधाजनक बनाया है, परंतु इसके कारण पर्यावरण को कई हानियाँ भी हुई हैं। उद्योगों और वाहनों से बढ़ता प्रदूषण, पेड़ों की कटाई, जल स्रोतों का दूषित होना, प्लास्टिक कचरे की वृद्धि तथा प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और अनेक जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर खतरा बढ़ता जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर विषयों पर विश्व स्तर पर समय-समय पर अनेक बैठकें और सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं। इन बैठकों में विभिन्न देशों के प्रतिनिधि मिलकर प्रदूषण कम करने, ग्लोबल वार्मिंग रोकने, वन संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा अपनाने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग पर चर्चा करते हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित जलवायु सम्मेलन (COP) जैसे मंचों पर पर्यावरण बचाने के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण मिल सके।
भारत सजग प्रहरी बनकर पर्यावरण सुरक्षा के लिए भरसक प्रयासरत है, परंतु क्रियान्वयन और जागरूकता में कहीं न कहीं चूक हो रही है।
अंत में यही संदेश देना चाहती हूँ कि—
"सोच बदलो — देश बदलेगा"
“एक पेड़ माँ के नाम” एक भावनात्मक अभियान है, लेकिन यदि पेड़ लगाकर उन्हें यूँ ही छोड़ दिया जाए, तो वह मात्र औपचारिकता बनकर रह जाता है। वहीं दूसरी ओर माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश में पूरी निष्ठा, समय और समर्पण लगा देते हैं।
अतः जैसा नया दौर है, वैसा ही हो आह्वान—
“एक पेड़ बच्चे के नाम”
“पेड़ को गोद लीजिए और बच्चे की तरह उसकी परवरिश कीजिए।”
जिस चीज़ से अपनापन जुड़ता है, उसकी देखभाल स्वतः होने लगती है।
“पेड़ लगाना शुरुआत है,
उसे बच्चे की तरह पालना ही सच्चा पर्यावरण संरक्षण है।”
मधु भूतड़ा 'अक्षरा' 
गुलाबी नगरी जयपुर से 
(Ek Pehal ब्लॉगर, साहित्यकारा, लेखिका, कवयित्री, समाज सेविका, सॉफ्टवेयर इंजीनियर) 
#ekpehalbymadhubhutra #EkPehal M : 9828153965

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