सीता नवमी विशेष: जनकनंदिनी वैदेही के आदर्श जीवन का प्रेरक संदेश-श्रीमती विमला जाजू

जनकसुता जग जननि जानकी, अतिसय प्रिय करुणानिधान की॥ ताके युग पद कमल मनावउँ जासु कृपा निर्मल मति पावउँ॥

सीता नवमी की आप सभी को बहुत बहुत बधाई। वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पुष्य नक्षत्र, दोपहर में जानकी जी का प्राकटय हुआ था। इसीलिए इस नवमी को हम सीतानवमी या जानकीनवमी के नाम से मनाते है। युग निर्मात्री भारत की सभ्यता संस्कारों का पुंज, तप, त्याग, धैर्य व सहनशिलता की प्रतिमूर्ति, उर्जा का स्रोत, धमनिष्ठ, कर्मनिष्ठ, वाल्मिको महाकाव्य की नायिका, श्री राम की प्राण बल्लभा, जनक नंदिनी सीता को हम उनके प्राकटय दिवस नमन करते हैं। हम उनकी अर्चाविग्रह का पूजन भी करते हैं, बड़ी धूमधाम से उत्सव भी मनाते हैं परंतु जिनका उत्सव मनाते हैं उनके चरित्र को पढ़ने और समझने की कोशिश नहीं की जा रही है। मेरे इस लेख का उद्धेश्य यह कि हम इनके अद्भुत चरित्र के बारे में पूर्णरूपेण समझे।

पतिव्रत धर्म का निर्वाह करते हुए सीता जी ने 14 वर्ष वनवास में प्रभु श्रीराम के साथ बिताये। परंतु भाग्य की विडंमना कि लंका पति रावण ने उनका वनवास काल में अपहरण कर लिया और आकाश मार्ग से लंका में ले, गया भगवान राम ने रावण से युद्ध कर अपनी प्राणप्रिय सीता को मुक्त कराया। परन्तु लंका से लौटने पर श्री राम ने मां सीता को ग्रहण करने से इन्कार करते हुए कहा रावण तुम्हें अपनी भुजाओं में उठाकर ले गया, तुम पर दूर्षित दृष्टि डाल चुका। ऐसी दशा में अपने कुल की मर्यादा हेतु तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूं।

इस प्रकार के कठोर कर्ण कटु, अनुचित शब्द सुनकर जनक नंदिनी सीता श्री राम को उपालंम भरा उत्तर देते हुए कहने लगी मैं भुतल से प्रकट हूं, विलक्षण हूं मेरा अचार विचार आलोकिक व दिव्य है। मुझ में चरित्र बल है। मैं इस मिथ्या कंलक से कलंकित होकर जीवित नहीं रह सकती। हे सुमित्रानंदन मेरे लिए चिता तैयार करो, मेरे दुख की यही दवा है। उन्होंने श्रीराम की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर अग्नि देव की परिक्रमा कर प्रज्वलित अग्नि में समा गई। कुछ ही समय में अग्नि देव विदेह नंदिनी सीता को पिता की भांति गोद में लिए चिता से ऊपर उठे उसी समय सीता जी प्रातः काल के सूर्य की भांति अद्भूत कांति से प्रकाशित हो रही थी। वह स्वर्ण आभूषणों आभा से युक्त थी। उनके अंग पर लाल रंग की रेशमी साड़ी लहरा रही थी। इस प्रकार अग्नि परीक्षा के बाद प्रभु श्री राम ने सीताजी को स्वीकार कीया।

कुछ समय सुखपूर्वक राजभवन बीता था कि प्रभु के पास संदेश आया कि जनपद के पुरवासियों में आपकी कीर्ति अपयश की चर्चा हो रही है। प्रभु श्रीराम की लोक निंदा, लोकापवाद के कारण राज धर्म की मर्यादा को केंद्र में रखते हुए सगर्भावस्था में मिथिलेश कुमारी का त्याग करना पड़ा। राम ने कहा जनपद के लोगों का सीता के प्रति घृणा पूर्ण भाव मेरे मर्म स्थल को विर्दीण कर रहा है। मैं और सीता दोनों ने उत्तम कुल में जन्म लिया है। जनक नंदिनी निष्पाप है। मेरी अंतरात्मा यशस्विनी सीता को विशुद्ध मानती है। उनकी अग्नि परीक्षा हो चुकी है। परंतु जनपद के लोगों में निंदा से मेरा हृदय व्याकुल है। लोकापवाद के कारण लक्ष्मण को आदेश दिया तुम सीता को ऋषियों के आश्रम के आसपास मुनिजन सेवित वन में पहुंचाओ। लक्ष्मण जी ने वैसा ही किया। वह महर्षि वाल्मीकि आश्रम के सन्निकट छोड़कर जाने के बाद जनक नंदिनी अपने आप को अकेली निःसहाय महसूस करते हुए किंकर्तव्यविमुढ होकर विलाप करते हुए प्राण त्यागने की निश्चय करने लगी। जैसे ही उन्होंने सोचा कि मैं सगर्भावस्था में हूं। ऐसे में पति का राजवंश नष्ट हो जाएगा। प्रभु ने तो मुझे लोकापबाद के डर से त्यागा है। इस अपवाद को दूर करना मेरा कर्तव्य है। इस प्रकार विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी कर्तव्यपरायणता पर बल दिया।

सीता जी को विलाप करते हुए कुछ ऋषि कुमारों ने देखा, और वाल्मीकिजी को सब घटना सुनाई, महर्षि ने आकर सीता जी को सांत्वना देते हुए कहा, मेरे आश्रम के पास तपस्विनी स्त्रियां रहती है, वह तुम्हारा पूर्ण ध्यान रखेंगी। तुम निश्चित निर्भय होकर यहां पर रहो। महर्षि ने उन तपस्वी स्त्रियों से सीताजी को मिलवाया। सीता जी बहुत समय तक वहां निवास किया। लव कुश का जन्म भी इस आश्रम में हुआ। कुछ समय के अंतराल प्रभुश्रीराम ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। वहां वाल्मीकिजी का लव कुश के साथ आगमन हुआ। वाल्मीकिजी के आदेश पर लव कुश ने वहां रामायण महाकाव्य का गान शुरू किया। उससे पता चला दोनों कुमार सीता के ही पुत्र हैं। तब श्री राम ने दूतों को वाल्मीकि ऋषि के पास भेजा और कहा कल मिथिलेश कुमारी इस सभा में आकर जन समुदाय में अपनी शुद्धता प्रमाणित कर मेरा कलंक दूर करने के लिए शपथ करें।

अगली प्रातः रामचंद्र जी यज्ञ शाला में पधारे समस्त ऋषियों एवं सहस्त्रों संख्या में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य भी वहां पधारे सीता जी का शपथ ग्रहण देखने के लिए ज्ञान निष्ठ, कर्म निष्ठ, योग निष्ठ सभी लोग पधारे महर्षि वाल्मीकिजी के पीछे जनक नंदिनी सिर झुकाए आ रही थी उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधार बह रही थी। वाल्मीकिजी ने कहा हे रघुनंदन आपने लोकापवाद के कारण मेरे आश्रम के समीप त्याग किया था। परंतु सीता धर्मपरायण व निष्पाप है। वह लोकापवाद से डरे हुए आपको अपनी शुद्धता का विश्वास दिलाएंगी।

तभी सीता जी ने तपस्वियो अनुरूप गैरूये वस्त्र धारण किये सभा में हाथ जोड़कर कहा, यदि मैंने प्रभु श्री राम के अतिरिक्त अपने मन, वचन कर्म से किसी भी अन्य पुरुष का चिंतन नहीं किया यह सत्य है तो भूदेवी मुझे अपनी गोद में स्थान दे। इसी समय भूतल से दिव्य रतनों से सुशोभित एक अद्भुत सिंहासन प्रकट हुआ। सिंहासन के साथ पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी भी प्रकट हुई। उन्होंने साध्वी सीता को दोनों भुजाओं से गोद में उठाकर सिंहासन पर बिठाया देखते-देखते भगवती जानकी रसातल प्रवेश करने लगी तभी आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी। देवता धन्य धन्य शब्द उच्चरित करने लगे। सीता नवमी के इस पर्व पर जनक नंदिनी सीता के बारे में मैं यह कहना चाहूंगी नारी शक्ति का आधार स्तंभ सीता का जीवन चरित्र कर्तव्यपरायणता, धर्मपरायणता, पतिपरायणता एवं कूलोचित मर्यादाओं के रक्षण का, विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में पलायन न करने का, नारी शक्ति के लिए विशेष संदेश देता है। इस प्रकार जीवन जीने की कला सिखाने का नाम वैदेही है। अति विशिष्ट होने का नाम वैदेही है। वर्तमान परिस्थितियों में उनके उच्च आदर्श हमें सन्मार्ग पर चलने को प्रेरित पर करते हैं।


श्रीमती विमला जाजू पाली-मारवाड (राज.)

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