AI का आज्ञाकारी युग - गुंजन मोहता

पहले हम थे कागज - कलम के अधिकारी,
अब अंगूठे की सेवा में बुद्धि बेचारी।
सोचते थे, लिखते थे, काटते थे बार-बार,
अब पूछो यंत्र से, “रच दो कुछ मनोहार!”
पिता का जन्मदिन आया, मन हुआ उदार,
पहले लिखते थे भावों से भरा उपहार।
अब आदेश दिया, “रच दो पंक्ति सम्मान की”,
और पढ़कर सुनाई, कविता पिता के गुणगान की!
प्रियतम बोले ,“ हृदय से कुछ लिख भेजो आज ।”,
उठाया यंत्र और बन गया प्रेम भरे शब्दों का साज !
पढ़कर बोले , “वाह! बड़ी गहरी हो गई हो तुम”,
हम मन ही मन बोले, “गहराई मेरी नहीं, यह यंत्र का है गुण!”
पहले जो “याद आते हो” कहते थे संकोच में,
अब लिखवा देते हैं पाँच पंक्तियाँ एक ही सोच में।
इतनी मिठास कि रसगुल्ला भी शर्मा जाए,
पर प्रेमी बोले, “यह सब पढ़कर मन क्यों न भरमाए?”
कार्यालय में भी बड़ा अनोखा हाल,
डाँट पड़े तो उत्तर भी यंत्र से तत्काल।
“त्रुटि के लिए क्षमा चाहती हूँ” ऐसा पत्र गया,
बॉस बोले, “इतना विनम्र तू कब से हो गयी ?”
बच्चे बोले, “माँ , विद्यालय का प्रोजेक्ट करवा दो”,
पिताजी बोले ,  “जाओ,AI से सब बनवा दो।”
बच्चा बोला, “तो फिर आप किस काम के?”,
हम बोले, “हम तो बस आदेश देने के नाम के!”
रिश्ते भी अब जैसे बन गए प्रतिलिपि के खेल,
हर संदेश एक-सा, न कम, न अधिक का मेल।
“जन्मदिवस मंगलमय हो”, सबको यही मिला,
जैसे भाव नहीं, बस बटन ही खिला।
पर सबसे बड़ी त्रासदी तो हम लेखकों पर आई है,
हिंदी की चाय में उर्दू की इलायची घुलवाई है।
जहाँ ‘मन’ था, वहाँ ‘दिल’ आ गया,
‘विचार’ की जगह ‘ख़याल’ आ गया।
हम लिखें “आकाश”, AI बोले “फ़लक लिखो”,
हम कहें “प्रेम”, वो कहे “इश्क़ का रंग चखो!”
शुद्ध हिंदी अब जैसे किसी संग्रहालय में सजी है,
और “लो-स्टैंडर्ड” हिंदी हर पोस्ट में बजी है।
तुक, छंद सब कोने में रोते हैं आज,
सरलता के नाम पर इन सब पर गिरी गाज।
मेहनत का मोल गया छुट्टी पर,
अंगूठा बन बैठा है ताकतवर अब हमारी मुट्ठी पर!
तो मित्रों, यह कैसी नई व्यवस्था आई,
जहाँ बुद्धि के उपयोग पर AI ने रोक लगाई ।
हम हँसते हैं इस सुविधा के विस्तार पर,
पर मन कहीं पूछता है बार-बार,
“हम लिख रहे हैं सचमुच !
या भावों का ठेका दे बैठे हैं इस यंत्र के व्यापार पर?

गुंजन मोहता, हिंगणघाट

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