| “तीज तिवांरा बावड़ी, ले डूबी गणगौर” — लोक आस्था, संस्कृति और नारी शक्ति का महापर्व |
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वर्धा। गणगौर केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, नारी शक्ति और अटूट भक्ति का जीवंत प्रतीक है। माहेश्वरी महिला मंडल, वर्धा द्वारा इस पावन अवसर पर विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर राजस्थानी परंपरा को जीवंत रखने का सराहनीय प्रयास किया जा रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें शाश्वत सौभाग्य का वरदान दिया। यही आस्था गणगौर पर्व के रूप में आज भी जन-जन में जीवित है। यह पर्व होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से प्रारंभ होकर चैत्र शुक्ल तृतीया तक 18 दिनों तक चलता है। इस दौरान कुंवारी कन्याएं और विवाहित महिलाएं पूजा-अर्चना कर अखंड सौभाग्य एवं मनपसंद वर की कामना करती हैं। पारंपरिक गीत— "गोर-गोर गोमती, ईसर पूजे पार्वती..." जैसे मधुर लोकगीत इस पर्व की आत्मा हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के निमाड़, मालवा, बुंदेलखंड एवं ब्रज क्षेत्र में विशेष रूप से मनाया जाने वाला यह पर्व लोकजीवन में गहराई से रचा-बसा है। मान्यता है कि माता गवरजा (पार्वती) होली के बाद अपने पीहर आती हैं और 18 दिन पश्चात ईसर (भगवान शिव) उन्हें ससुराल ले जाने आते हैं। इस भावपूर्ण मिलन के बाद विसर्जन किया जाता है। राजस्थानी कहावत— “तीज तिवांरा बावड़ी, ले डूबी गणगौर” का तात्पर्य है कि सावन की तीज से प्रारंभ हुए उत्सवों का क्रम गणगौर विसर्जन के साथ विराम लेता है। माहेश्वरी मंडल, वर्धा के समन्वयक राजकुमार जाजू के अनुसार, गणगौर केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, संयम, कृतज्ञता और सांस्कृतिक मूल्यों का उत्सव है। लोकगीतों के माध्यम से गवरजा को बहन और ईसर को जीजाजी के रूप में संबोधित कर पूजा की जाती है, जो भारतीय पारिवारिक परंपराओं की अनूठी झलक प्रस्तुत करता है। आज के आधुनिक दौर में, जब पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में गणगौर जैसे त्योहार हमारी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि— “सुंदरता भक्ति में है और भक्ति हमारे दैनिक जीवन में।” माहेश्वरी महिला मंडल, वर्धा द्वारा नव-निर्वाचित अध्यक्ष सुनीता राठी एवं सचिव छाया पसारी के नेतृत्व में गणगौर नृत्य, ईसर-पार्वती रूप सज्जा, लोकगीत गायन, विसर्जन यात्रा एवं सामूहिक उद्यापन जैसे अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। विशेष रूप से नई बहुओं एवं युवा पीढ़ी को संगठन से जोड़ने के प्रयास भी सराहनीय हैं। शनिवार सायं समस्त राजस्थानी समाज द्वारा महंत नंदकिशोर पीपलवा के नेतृत्व में भव्य विसर्जन शोभायात्रा का आयोजन किया जा रहा है, जो इस पर्व का प्रमुख आकर्षण रहेगा। गणगौर हमें सिखाता है कि— आस्था में शक्ति है, संस्कृति में पहचान है और परंपराओं में ही हमारी जड़ों की असली पहचान छिपी है |