युवा होना : एक जिम्मेदारी - डॉ. राधेश्याम लाहोटी, नोखा

स्वामी विवेकानंद को याद करना केवल एक तिथि मनाना नहीं है, बल्कि स्वयं से एक प्रश्न पूछना है कि क्या मैं सचमुच जाग रहा हूँ?

युवा होना उम्र का प्रमाण नहीं, चेतना की स्थिति है। शरीर भले ही खड़ा हो, पर यदि सोच उधार की है, निर्णय टाले जाते हैं और जिम्मेदारी से बचा जाता है, तो वह युवावस्था नहीं, सिर्फ समय की खपत है।

विवेकानंद ने कभी भी भीड़ को नहीं जगाया, उन्होंने व्यक्ति को जगाया। उनका विश्वास था कि जब व्यक्ति भीतर से मजबूत होता है, तभी समाज बदलता है। इसलिए वे नारे नहीं देते, दिशा देते हैं। वे सिखाते हैं कि बाहुबल से पहले आत्मबल चाहिए, और आत्मबल चरित्र से जन्म लेता है।

आज का युवा अक्सर भाग्य, व्यवस्था या परिस्थितियों को दोष देता है। लेकिन विवेक की दृष्टि कहती है कि जो स्वयं को जीत ले, वही परिस्थितियों को बदलने की क्षमता रखता है।

ईश्वर को मंदिरों में खोजने से पहले, दुखी मनुष्य में पहचानना होगा। सेवा कोई अतिरिक्त कार्य नहीं, बल्कि परिपक्व चेतना की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। जो युवा हर दिन खुद को थोड़ा बेहतर बनाने का साहस करता है, वही भविष्य की नींव रखता है। इसलिए आज का संकल्प बड़ा नहीं, सच्चा होना चाहिए।

मैं जागूँगा। मैं जिम्मेदारी लूँगा। मैं अपने भीतर का भारत बनूँगा।

डॉ. राधेश्याम लाहोटी, नोखा

(ज्योतिष विशेषज्ञ, लेखक एवं विचारक)

मोबाइल 9414147238, 9413547238

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