एक सवाल… जिसका जवाब माँ के पास नहीं था - भारती सुजीत बिहानी
तीज का त्योहार था।
चारों ओर उत्सव का माहौल था। घर-आँगन में रौनक थी। कहीं मेहंदी की खुशबू थी, तो कहीं सुहाग के गीतों की मधुर आवाज़ सुनाई दे रही थी।
राधिका सुबह से ही तीज की तैयारियों में लगी हुई थी। पूजा की थाली सजा चुकी थी। लाल चुनरी, मेहंदी और सुहाग की सारी चीज़ें करीने से रखी थीं।
काम निपटाकर उसने अपनी बेटी को फोन लगाया।
कुछ देर तक माँ-बेटी के बीच हँसी-मजाक और घर-परिवार की बातें होती रहीं। तभी अचानक बेटी की आवाज़ थोड़ी गंभीर हो गई।
“मम्मा… एक बात पूछूँ?”
राधिका मुस्कुराते हुए बोली,
“हाँ बिटिया, पूछो।”
“मम्मा… नाराज़ तो नहीं होगी?”
“अरे नहीं, ऐसी क्या बात है? पूछो।”
बेटी कुछ पल चुप रही, फिर बोली—
“मम्मा, एक बात मेरी समझ में नहीं आती… पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी ही व्रत क्यों करती है?”
राधिका चुप हो गई।
बेटी ने फिर पूछा—
“क्या पत्नी को लंबी उम्र नहीं चाहिए?”
राधिका के हाथ जैसे ठिठक गए।
जिस पूजा की थाली वह अभी सजा रही थी, उसी पर उसकी नज़र टिक गई।
बेटी बोलती रही—
“मम्मा, बचपन से देखती आई हूँ कि तीज हो या करवा चौथ, पत्नी पति की लंबी उम्र की कामना करती है। निर्जल व्रत रखती है, पूजा करती है, दुआ माँगती है। इसमें गलत कुछ नहीं है… प्रेम से किया गया व्रत बहुत खूबसूरत भावना है।”
“लेकिन अगर पति भी अपनी पत्नी के लिए उसी तरह व्रत रखे, उसकी लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करे, तो क्या वह प्रेम और भी सुंदर नहीं होगा?”
राधिका के पास कोई जवाब नहीं था।
वह अपनी बेटी की बात सुन रही थी, मगर उसके मन में जैसे वर्षों पुराने कई दृश्य एक साथ घूमने लगे।
उसे याद आया—उसकी माँ भी तीज का व्रत रखती थीं। दादी भी रखती थीं। उसने भी विवाह के बाद इसे परंपरा समझकर निभाना शुरू कर दिया था।
कभी उसने यह सवाल खुद से पूछा ही नहीं था।
उसने हमेशा यही माना था कि
“पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी का व्रत रखना ही तो तीज है।”
लेकिन आज बेटी ने एक छोटा-सा सवाल पूछकर उसके सामने सोचने का एक नया दरवाज़ा खोल दिया था।
राधिका ने धीरे से कहा—
“बेटा… शायद परंपराएँ हमें बहुत कुछ सिखाती हैं, लेकिन कभी-कभी उनके पीछे छिपे भाव को नए समय की नज़र से समझना भी जरूरी होता है।”
बेटी मुस्कुराई।
“तो मम्मा, इस बार आप मेरे लिए एक और प्रार्थना करना।”
“क्या?”
“अपने लिए भी।”
राधिका की आँखें नम हो गईं।
“हाँ बिटिया… इस बार मैं अपने लिए भी प्रार्थना करूँगी।”
बेटी ने हँसते हुए कहा—
“और पापा से भी कहना कि आपकी लंबी उम्र के लिए वो भी कुछ माँगें।”
दोनों हँस पड़ीं।
फोन कट गया।
राधिका कुछ देर तक वैसे ही बैठी रही।
फिर उसने पूजा की थाली में एक दीपक जलाया और हाथ जोड़कर बोली—
“हे माँ गौरी, मेरे सुहाग को सुखी और स्वस्थ रखना… और मुझे भी इतनी ही अच्छी सेहत, लंबी उम्र और खुशियाँ देना, ताकि हम दोनों जीवन की राह साथ-साथ पूरी कर सकें।”
उस दिन राधिका ने तीज का व्रत रखा।
लेकिन पहली बार उसे लगा कि व्रत केवल किसी एक की लंबी उम्र की कामना नहीं, बल्कि दो दिलों की एक-दूसरे के लिए मंगलकामना का नाम भी हो सकता है।
परंपरा अपनी जगह थी…
प्रेम अपनी जगह।
और उस दिन राधिका ने अपनी बेटी के एक मासूम सवाल से यह सीख लिया था कि—
रिश्ता तभी खूबसूरत होता है,
जब दुआ दोनों के लिए हो,
चिंता दोनों की हो,
और जीवन की राह भी दोनों साथ चलें।
बेटी का सवाल छोटा था,
लेकिन उसने राधिका के मन में
एक बहुत बड़ी सोच जगा दी थी।

भारती सुजीत बिहानी
सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल

+91 9475617117

Recent News

Advertisement

Recent Edition

Copyrights © all rights reserved || Develop by : Deganahalchal