अनशन लोकतंत्र में आवाज़ उठाने का शांतिपूर्ण तरीका. अनशन - मधु भूतड़ा 'अक्षरा'
अनशन (Hunger Strike) एक शांतिपूर्ण विरोध का तरीका है, जिसमें व्यक्ति  व्यापक जनहित के लिए अपनी मांग या विरोध दर्ज कराने के लिए स्वेच्छा से भोजन का त्याग करता है।
अनशन का उद्देश्य किसी पर शारीरिक बल प्रयोग करना नहीं, बल्कि नैतिक और जनमत का दबाव बनाकर अपनी बात समाज एवं सरकार तक पहुँचाना होता है।
अनशन के विविध रूप इस तरह हैं, प्रतीकात्मक अनशन कुछ घंटों या एक दिन का, क्रमिक अनशन अलग-अलग लोग बारी-बारी से अनशन करते हैं और आमरण अनशन मांग पूरी होने तक या गंभीर रूप से स्वास्थ्य प्रभावित होने तक जारी रहते हैं।
अनशन में अपनी रणनीतियाँ होती हैं, कुछ लोग केवल पानी पीते हैं या नमक, नींबू या ग्लूकोज़ लेते हैं, यह आंदोलन के स्वरूप पर निर्भर करता है। लंबे अनशन में डॉक्टर नियमित रूप से रक्तचाप, नाड़ी, वजन और अन्य स्वास्थ्य संकेतकों की जांच करते हैं। स्वास्थ्य अत्यधिक बिगड़ने पर प्रशासन या चिकित्सक अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दे सकते हैं या कानून के अनुसार हस्तक्षेप कर सकते हैं।
अनशन उचित माना जा सकता है यदि जो समस्याएं हो रही हैं,उसके लिए संवाद, ज्ञापन, याचिका और अन्य लोकतांत्रिक उपाय अपनाए जा चुके हों और फिर भी समाधान नहीं मिल रहा है, लेकिन यह अनुचित है यदि इसका उपयोग हर मांग मनवाने के साधन के रूप में किया जाए, जो मांगें कानून या संविधान के विरुद्ध हों।
अगर हम भारतीय लोकतंत्र के पुराने काल का स्मरण करते हैं तो भारत में अनशन का एक लंबा इतिहास है। महात्मा गांधी ने इसे नैतिक दबाव और अहिंसक प्रतिरोध का माध्यम बनाया। स्वतंत्र भारत में भी कई आंदोलनों में इसका प्रयोग हुआ है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था यह भी मानती है कि अंतिम समाधान संवाद, जांच, कानून और संस्थागत प्रक्रिया से ही होना चाहिए।
अभी देश में सोनम वांगचुक लद्दाख के निवासी प्रसिद्ध इंजिनियर, शिक्षाविद्, पर्यावरणविद् और समाज सुधारक अनशन पर हैं। आप रेमन मैग्सेसे एवं रोलेक्स अवार्ड जैसे अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित हैं। हाल ही में देश में लगातार नीट के पेपर का लीक होना, छात्रों का आत्महत्या का मामला राजनीतिक और रणनीतिक ऐसे प्रश्न तैयार करता है, जिसे शिक्षा मंत्री के नेतृत्वता की असफलता माना गया, अतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने इस पूरे प्रकरण को अपनी देख-रेख में ले लिया।
वांगचुक के वर्तमान अनशन का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही, परीक्षा पत्र लीक जैसे मुद्दों पर सही कार्यवाही और सुधार की मांग रखता है। उनके आंदोलन को जन समर्थन मिला है लेकिन यह कहना भी संभव नहीं है कि इससे उनकी सभी मांगी पूरी होगी या देश की व्यवस्था बदल जाएगी, इसलिए अनशन परिवर्तन का एक माध्यम हो सकता है लेकिन परिवर्तन की गारंटी नहीं।
सबसे बड़ी बात यह है कि जैसे ही अनशन होता है, वैसे ही देश की राजनीति पूर्ण रूपेण सक्रिय हो जाती है, विपक्ष उसे भुनाने में लगता है और पक्ष उसे सुलझाने में। दोनों सेल सक्रिय हो जाते हैं और इसके साथ मीडिया एवं देश की जनता भी।
यह सच है कि कोई एक व्यक्ति पूरे देश को नहीं बदल सकता लेकिन इतिहास बताता है कि कुछ आंदोलन ने महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत की है, उदाहरण के तौर पर महात्मा गांधी, अन्ना हजारे, पोट्टी श्री रामुलू के आंदोलन ने बड़े सार्वजनिक विमर्श और कुछ नीतिगत बदलावों को जन्म दिया।
इसी कारण लोकतंत्र में अनशन को एक अहिंसक विरोध का माध्यम माना जाता है, लेकिन साथ ही यह भी अपेक्षा की जाती है कि विवादों का समाधान अंततः संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया से निकले।
प्रश्न यह है कि "क्या सोनम वांगचुक का शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर अनशन सही है?"
यदि बार-बार परीक्षा संबंधी गंभीर अनियमितताएँ हुई हैं,
छात्रों का विश्वास डगमगाया है और उन्हें लगता है कि मंत्री नैतिक रूप से जिम्मेदार हैं, तो इस्तीफे की मांग लोकतांत्रिक विरोध का एक तरीका हो सकती है।
यदि सरकार का तार्किक पक्ष यह है कि जांच एजेंसियां काम कर रही हैं, दोषियों पर कार्रवाई हो रही है और जब तक मंत्री की व्यक्तिगत जिम्मेदारी या लापरवाही सिद्ध न हो जाए, तब तक इस्तीफे की मांग उचित नहीं मानी जा सकती।
संतुलित आकलन यह है कि केवल अनशन या जनदबाव से किसी मंत्री का इस्तीफा अनिवार्य हो जाना लोकतांत्रिक सिद्धांत नहीं है।इस्तीफा देना या न देना राजनीतिक नेतृत्व का निर्णय होता है, जो तथ्यों, जांच और जवाबदेही के आधार पर लिया जाता है। वर्तमान सरकार से नीतिगत निर्णय की सदैव अपेक्षा रही है।
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन और उसकी सांसे सबसे महत्वपूर्ण है, अतः अनशन की इस प्रक्रिया में किसी का भी जीवन  दांव पर नहीं लगना चाहिए, ऐसा मेरी कलम का अनुरोध और जनता की आवाज है।
मधु भूतड़ा 'अक्षरा'
गुलाबी नगरी जयपुर से
(संपादिका, लेखिका, कवयित्री)
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मोबाइल - 9828153965

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