| गौवंश संरक्षण : आस्था, संवेदना और राष्ट्र का उत्तरदायित्व... - मधु भूतड़ा 'अक्षरा' |
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"गाय को केवल राष्ट्रीय पशु मानने की भूल न करें, वह अपने आप में एक संपूर्ण राष्ट्र की आत्मा है।" गाय भारतीय संस्कृति, सभ्यता और आस्था का अभिन्न अंग है। भगवान श्रीकृष्ण के समय से ही गौ को मातृस्वरूप मानने की परंपरा रही है। यथार्थ यह है कि कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात् दर्शन सिर्फ गौ माता के स्वरूप में ही किया जा सकता है। भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में भी गौवंश संरक्षण और संवर्धन का उल्लेख मिलता है। इसलिए गौ संरक्षण केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर, कृषि व्यवस्था, पर्यावरण और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा राष्ट्रीय दायित्व है। जब मनुष्य किसी मूक प्राणी की आँखों को पढ़ना सीख लेता है, तब उसके हृदय में सच्ची मानवता का जन्म होता है। गौ सेवा केवल पूजा या अनुष्ठान नहीं, बल्कि करुणा, दया और परोपकार का जीवंत रूप है। एक समय भारत के गाँव गौशालाओं, बछड़ों की किलकारियों और गोबर से लीपे आँगनों की सौंधी सुगंध से महकते थे। आज अनेक गायें सड़कों पर भूख, प्यास, प्लास्टिक और दुर्घटनाओं का शिकार होती दिखाई देती हैं, जो अत्यंत दयनीय है। गाय ने सदियों से भारतीय जीवन को केवल दूध ही नहीं दिया, बल्कि खेतों को उर्वरता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आधार, पर्यावरण को संतुलन और संस्कृति को संस्कार दिए हैं। "गावो विश्वस्य मातरः" का वैदिक उद्घोष इसी व्यापक जीवन-दर्शन का परिचायक है। भारत विश्व के सर्वाधिक गौवंश वाले देशों में है, फिर भी चरागाहों का सिकुड़ना, किसानों की आर्थिक कठिनाइयाँ, आवारा गौवंश की बढ़ती संख्या तथा देशी नस्लों का संरक्षण जैसी चुनौतियाँ गंभीर चिंता का विषय हैं। गिर, साहीवाल, थारपारकर, राठी, कांकरेज, हरियाणा और लाल सिंधी जैसी देशी नस्लों का संरक्षण हमारी जैव विविधता और कृषि के भविष्य के लिए आवश्यक है। गाय से प्राप्त दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर को पंचगव्य कहा जाता है। गोबर का उपयोग जैविक खाद, बायोगैस और प्राकृतिक ऊर्जा के रूप में व्यापक रूप से होता है। गोमूत्र तथा पंचगव्य-आधारित उत्पादों पर वैज्ञानिक अनुसंधान निरंतर जारी हैं। जहाँ वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हों, वहीं उनके उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी भी गौ संरक्षण को भारतीय संस्कृति और करुणा का प्रतीक मानते थे। उन्होंने कहा था कि किसी समाज की संवेदनशीलता का आकलन उसके निर्बल प्राणियों के प्रति व्यवहार से किया जा सकता है। दुर्भाग्यवश गौ संरक्षण मात्र राजनीतिक विमर्श तक सीमित होकर रह जाता है। जैसे-जैसे चुनावी माहौल में गर्मी आती है, गौ अत्याचार एवं हत्या के मामले अखबारों की हेडलाइंस बनते हैं, सनातन-विरोधी तत्व सक्रिय हो जाते हैं, गाय भाषणों का कंटेंट बन जाती है, सुरक्षा के नाम पर हिंसा भड़कती है। ऐसी परिस्थितियों का जन्म अत्यंत पीड़ा देता है। वास्तविक संरक्षण तभी संभव है, जब इसे राजनीति नहीं, बल्कि जनभागीदारी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और दीर्घकालिक नीति से जोड़ा जाए। आधुनिक तकनीक इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। प्रत्येक गौवंश का डिजिटल पंजीकरण, ईयर टैग, स्वास्थ्य निगरानी, वैज्ञानिक प्रजनन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से रोगों की प्रारंभिक पहचान तथा गोबर-आधारित बायोगैस और जैविक उत्पादों को बढ़ावा देकर संरक्षण को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। सरकार को देशी नस्लों के संरक्षण, गौशालाओं को पारदर्शी आर्थिक सहायता, चरागाहों के विकास, पशु चिकित्सालयों के विस्तार, आवारा गौवंश के पुनर्वास तथा गौ-आधारित ग्रामीण उद्योगों को प्रोत्साहन देने की दिशा में निरंतर कार्य करना चाहिए। वहीं प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व है कि वह प्लास्टिक कचरा खुले में न फेंके, अस्वस्थ एवं ज़ख्मी गौवंश की सूचना दे, गौशालाओं में सहयोग करे तथा वृद्ध एवं निशक्त गौ माताओं के भोजन और जल की व्यवस्था में अपनी सहभागिता निभाए। हाल ही में, 27 मई 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय ने गौवंश संरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान राज्य प्रशासन को गौशालाओं की स्थिति सुधारने, घायल एवं परित्यक्त गौवंश की समुचित देखभाल सुनिश्चित करने, पर्याप्त पशु-चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराने तथा पशु-क्रूरता रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए। न्यायालय ने गौ संरक्षण के प्रति प्रशासनिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदनशीलता पर विशेष बल दिया। गौवंश संरक्षण केवल गायों की संख्या बढ़ाने का अभियान नहीं, बल्कि उनके सम्मानजनक जीवन, स्वास्थ्य, पोषण और संरक्षण का संकल्प है। जब सरकार, समाज, किसान, वैज्ञानिक और गौसेवी संगठन मिलकर कार्य करेंगे, तभी गौ संरक्षण एक सशक्त जनआंदोलन का रूप ले सकेगा। करुणा और दया से प्रेरित प्रत्येक छोटा प्रयास हमारी सांस्कृतिक धरोहर, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा करेगा। "गाय पशु नहीं, प्राण है। आत्मा ने यह पुकारा है। गौ-हत्या को बंद करो, यही राष्ट्र का नारा है।" मधु भूतड़ा 'अक्षरा' गुलाबी नगरी जयपुर से (संपादिका, लेखिका, कवयित्री)
मधु भूतड़ा 'अक्षरा'
गुलाबी नगरी जयपुर से (Ek Pehal ब्लॉगर, साहित्यकारा, लेखिका, कवयित्री, समाज सेविका, सॉफ्टवेयर इंजीनियर) #ekpehalbymadhubhutra #EkPehal M : 9828153965 |