लखनऊ में गणगौर पर्व धूमधाम से मनाया गया

राजस्थानी परंपरा और संस्कृति के प्रतीक गणगौर पर्व का आयोजन लखनऊ के मारवाड़ी गली में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ किया गया। यह कार्यक्रम पंकज माहेश्वरी के निवास स्थान पर संपन्न हुआ, जिसमें समाज की महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। गणगौर पर्व के अवसर पर महिलाओं द्वारा गणगौर माता की मूर्तियों को मिट्टी से बनाकर उन्हें दुल्हन के रूप में सुसज्जित किया गया। पूजा के दौरान पारंपरिक लोकगीत जैसे गौड़-गौड़ गोमती गाकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया गया।

इस अवसर पर विभिन्न स्वरूपों की मूर्तियाँ बनाई गईं, जिनमें प्रमुख रूप से ईसरजी (भगवान शिव का स्वरूप), गौराजी (माता पार्वती का स्वरूप), कानीराम जी (ईसरजी के भाई का स्वरूप), रोवाबाई एवं सोवाबाई (ईसरजी की बहनों का स्वरूप), मालन (कुछ परंपराओं में मालिन का स्वरूप) शामिल थीं।

गणगौर पर्व की शुरुआत धुलंडी (होली के अगले दिन) से होती है और यह लगातार 16 दिनों तक मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार, होली के अवसर पर गौराजी अपने मायके (पीहर) आती हैं और आठ दिन बाद ईसरजी उन्हें वापस लेने आते हैं। इसके पश्चात चैत्र शुक्ल तृतीया को उनकी विधिवत विदाई होती है। इसी दिन गौराजी ने सभी महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान किया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गणगौर की पूजा सर्वप्रथम स्वयं माता पार्वती ने ईसरजी की मूर्ति बनाकर की थी, जिससे उन्हें शिव रूप में अखंड सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस पावन अवसर पर आयुषी माहेश्वरी ने विवाह के पश्चात अपनी पहली गणगौर पूजा विधिवत संपन्न की। उनके साथ स्नेह माहेश्वरी, ज्योति माहेश्वरी, पूजा माहेश्वरी, राधिका माहेश्वरी एवं प्रियांशी माहेश्वरी ने भी श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजन किया। पूरे आयोजन में पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत और सामूहिक भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला, जिसने राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया।

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