महेश नवमी संदेश - त्रिभुवन काबरा
महेश नवमी का यह दिवस हम सभी माहेश्वरी समाजजनों के लिए अत्यंत पावन एवं गौरवपूर्ण है, क्योंकि यही वह दिन है जब हमारे वंश की उत्पत्ति भगवान महेश (शिव) के आशीर्वाद से हुई थी। माहेश्वरी का अर्थ ही है — भगवान शिव का वंशज।
आज हमारा समाज व्यापार, सेवा, उद्योग, प्रोफेशन तथा शिक्षा के हर क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है। हाल के वर्षों में हमारे समाज से कई होनहार युवक-युवतियाँ आईएएस, आईपीएस जैसे उच्च पदों पर चयनित हुए हैं। साथ ही राजनैतिक क्षेत्र में भी हमारी भागीदारी बढ़ रही है — यह सब हम सभी के लिए गर्व का विषय है।
किन्तु, इन उपलब्धियों के बीच कुछ गंभीर चिंताएँ भी सामने आ रही हैं। समाज की कुल जनसंख्या धीरे-धीरे घट रही है और हमारी सांस्कृतिक परंपराएँ भी लुप्त होती जा रही हैं। समाज द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रोत्साहन और सहायता दिए जाने के बावजूद, विवाह और संतानोत्पत्ति में विलंब होना और उसमें भी नवविवाहित दम्पत्तियों की हम दो, हमारे एक अथवा हम संतानोत्पत्ति करें ही क्यों, जैसी सोच हमारे भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
वर्तमान पीढ़ी में आत्मकेंद्रितता, अहंकार तथा मैं ही सब कुछ हूँ जैसी सोच के कारण वैवाहिक जीवन में तनाव बढ़ रहा है, जिससे तलाक के मामले भी चिंताजनक रूप से बढ़े हैं। इसके अतिरिक्त, अंतरजातीय विवाह भी एक गंभीर विषय बनता जा रहा है।
इन सभी विषयों को ध्यान में रखते हुए, हमें मिलकर यह विचार करना होगा कि आदर्श माहेश्वरी समाज का भविष्य कैसे सुरक्षित रखा जाए। बदलते समय के साथ हमें थोड़े बहुत समझौते करने पड़ सकते हैं, किंतु मूल संस्कृति व पहचान को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। यदि विशेष परिस्थिति में समझौता करना ही पड़े तो विवाह संबंध हमारे मूल प्रादेशिक क्षेत्र व समकक्ष जातियों में ही किए जाएँ, यही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही, यदि युवक-युवती विवाह योग्य हो जाएँ, तो यथासंभव समय पर उनका विवाह कर देना चाहिए, ताकि कम उम्र की बहू परिवार और वातावरण में सहजता से ढल सके। जब कोई कम उम्र की लड़की बहू बनकर घर आती है, तो उसे बेटी की तरह अपनाकर उसकी इच्छानुसार पढ़ाई जारी रखने देनी चाहिए तथा उसकी रुचि के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता भी देनी चाहिए। साथ ही, ईश्वर की कृपा से घर का माहौल ऐसा बना रहना चाहिए कि पुन: एक बार माँ-बेटी के रिश्ते का अनुभव हो सके।
समाज की समृद्धि केवल आर्थिक या राजनैतिक विकास से नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन, संस्कृति की रक्षा और पारिवारिक मूल्यों से भी होती है। इस महेश नवमी पर हम सब यह संकल्प लें कि हम अपनी अगली पीढ़ी को इन मूल्यों से जोड़ेंगे और एक संगठित, संस्कारी तथा समर्थ माहेश्वरी समाज का निर्माण करेंगे।
आज हमारा समाज व्यापार, सेवा, उद्योग, प्रोफेशन तथा शिक्षा के हर क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है। हाल के वर्षों में हमारे समाज से कई होनहार युवक-युवतियाँ आईएएस, आईपीएस जैसे उच्च पदों पर चयनित हुए हैं। साथ ही राजनैतिक क्षेत्र में भी हमारी भागीदारी बढ़ रही है — यह सब हम सभी के लिए गर्व का विषय है।
किन्तु, इन उपलब्धियों के बीच कुछ गंभीर चिंताएँ भी सामने आ रही हैं। समाज की कुल जनसंख्या धीरे-धीरे घट रही है और हमारी सांस्कृतिक परंपराएँ भी लुप्त होती जा रही हैं। समाज द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रोत्साहन और सहायता दिए जाने के बावजूद, विवाह और संतानोत्पत्ति में विलंब होना और उसमें भी नवविवाहित दम्पत्तियों की हम दो, हमारे एक अथवा हम संतानोत्पत्ति करें ही क्यों, जैसी सोच हमारे भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
वर्तमान पीढ़ी में आत्मकेंद्रितता, अहंकार तथा मैं ही सब कुछ हूँ जैसी सोच के कारण वैवाहिक जीवन में तनाव बढ़ रहा है, जिससे तलाक के मामले भी चिंताजनक रूप से बढ़े हैं। इसके अतिरिक्त, अंतरजातीय विवाह भी एक गंभीर विषय बनता जा रहा है।
इन सभी विषयों को ध्यान में रखते हुए, हमें मिलकर यह विचार करना होगा कि आदर्श माहेश्वरी समाज का भविष्य कैसे सुरक्षित रखा जाए। बदलते समय के साथ हमें थोड़े बहुत समझौते करने पड़ सकते हैं, किंतु मूल संस्कृति व पहचान को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। यदि विशेष परिस्थिति में समझौता करना ही पड़े तो विवाह संबंध हमारे मूल प्रादेशिक क्षेत्र व समकक्ष जातियों में ही किए जाएँ, यही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही, यदि युवक-युवती विवाह योग्य हो जाएँ, तो यथासंभव समय पर उनका विवाह कर देना चाहिए, ताकि कम उम्र की बहू परिवार और वातावरण में सहजता से ढल सके। जब कोई कम उम्र की लड़की बहू बनकर घर आती है, तो उसे बेटी की तरह अपनाकर उसकी इच्छानुसार पढ़ाई जारी रखने देनी चाहिए तथा उसकी रुचि के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता भी देनी चाहिए। साथ ही, ईश्वर की कृपा से घर का माहौल ऐसा बना रहना चाहिए कि पुन: एक बार माँ-बेटी के रिश्ते का अनुभव हो सके।
समाज की समृद्धि केवल आर्थिक या राजनैतिक विकास से नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन, संस्कृति की रक्षा और पारिवारिक मूल्यों से भी होती है। इस महेश नवमी पर हम सब यह संकल्प लें कि हम अपनी अगली पीढ़ी को इन मूल्यों से जोड़ेंगे और एक संगठित, संस्कारी तथा समर्थ माहेश्वरी समाज का निर्माण करेंगे।
त्रिभुवन काबरा (भाईजी), बड़ौदा (गुजरात)
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