विचार मंथन - स्वकेंद्रित होता युवा वर्ग 'मेरा जीवन, मेरा अधिकार' सामाजिक एवं पारिवारिक परिपेक्ष में कहां तक उचित

जैसे-जैसे हम प्राकृतिक संरचनाओं से हटकर भौतिकवाद की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे ही नए-नए विचारों की श्रृंखलाओं से हमें आत्मसात होना पड़ रहा है। बचपन से ही मिलती रही सुख सुविधाओं के परिणामस्वरुप किशोर एवं युवावस्था आते-आते अधिकार जताने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। अपने कर्तव्यों को अनदेखा करके अपने जीवन की स्वतंत्रता की बात होने लगी है, जो कि समाज और परिवार के स्थापित मूल्यों लिए बहुत ही प्रतिकूल स्थिति बनती जा रही है। इस विकट सामयिक समस्या पर इचलकरंजी में महेश नवमी महोत्सव अंतर्गत विचार मंथन प्रतियोगिता एवं चर्चा सत्र का आयोजन किया गया। जिसमें विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार रखें ताकि इस विचारधारा को सही दिशा मिल सके।
सर्वप्रथम द्वारकाधीश चांडक ने अपने उद्बोधन में कहा कि युवा वर्ग बचपन और बुढ़ापे के बीच की कड़ी है, परंतु आपस में जुड़ाव की कमी है। युवा वर्ग को सामाजिक धारा में लाने के लिए नए चेहरों की आवश्यकता है। उन्हें दुत्कारने की बजाय धर्म और संस्कृति का आधार लेकर प्रेरित करने की जरूरत है। युवा वर्ग को भी कोई ना कोई मसीहा जरूर मिलेगा जो इस अधिकार जताने की प्रवृति को रोकने में दिशा दे सकेगा। 
नेहा माहेश्वरी ने युवा वर्ग के लिए प्यार और आत्मसम्मान देने पर जोर दिया। अपने अधिकार की बात परिवार के साथ बैठकर होनी चाहिए और ऐसा बदलाव आना चाहिए कि मेरा जीवन की अपेक्षा हमारा जीवन हमारा अधिकार की भावना आनी चाहिए।
सौ. आरती भराडिया ने स्वकेंद्रित शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि सर्वप्रथम स्वयं की खुशी सबसे महत्वपूर्ण है, स्वयं खुश रहेगा तभी तो परिवार और समाज के लिए कुछ कर पाएगा। भारत में युवाओं की आबादी 65 प्रतिशत है तभी तो इतनी ऊर्जा का प्रवाह है. युवाओं में धैर्य की कमी है, परंतु बड़ों को भी अपने बड़प्पन को बनाए रखना होगा। 6 वर्ष की उम्र से ही बच्चों को राम और विवेकानंद आदि महापुरुषों के आदर्श सिखाने होंगे।
सौ. उषा जाजू ने युवाओं की स्वकेन्द्रित बनने की अवधारणा पर चोट करते हुए कहा कि बचपन से ही मेरा साबुन, मेरा शैंपू, मेरा कप आदि छोटी-छोटी बातों से अधिकार पाने की भावना का निर्माण होते-होते आगे यह मानसिकता बड़ा रूप ले लेती है। बचपन से ही हम जाने अनजाने यह बीज डाल देते हैं इस पर हमे  सावधानी बरतने की जरूरत है।
प्रतीक हेडा ने बताया कि स्वकेंद्रित होने से ही आज का युवा वर्ग आत्मनिर्भर बन पाएगा। उसे परिवार से समर्थन एवं समुचित स्नेह की जरूरत है। सोशल मीडिया का जरूर कुछ दुष्प्रभाव है, उसे रोकने के लिए परिवार, युवा वर्ग और टेक्नोलॉजी में संतुलन बनाना होगा।
युवा वर्ग स्वकेंद्रित क्यों होता जा रहा है, इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए अखिल बाहेती ने कहा कि हमने बचपन से ही कहीं ना कहीं 'तू जाणे, थारो काम जाणे' इस भावना को प्रेरित किया, जिसका परिणाम आज हमारे सामने दिख रहा है। बच्चों से सकारात्मक बात करने की आदत डालनी होगी, जैसे तुम्हारा अधिकार तुम्हें उम्र के उस पड़ाव पर ऐसे ऐसे मिलता जाएगा। स्वकेन्द्रित भावना को रोकने के लिए तथा परिवार के सभी सदस्यों मे आपसी जुड़ाव के लिए समय-समय पर फैमिली के get -togather कार्यक्रम करते रहने चाहिए।
डिंपल मंत्री ने कहा कि इस विषय पर युवाओं को दोष देना भी ठीक नहीं है, आज की fast life एवं प्रतिस्पर्धा के युग में अपने स्वयं के विकास के लिए उसे confidance देने की बहुत जरूरत है, नहीं तो वे डिप्रेशन में चले जाते हैं। आज का युवा समाज का प्रतिबिंब है इसलिए समाज को उसे सपोर्ट करना चाहिए। 
सिर्फ मेरा अधिकार की बात करना भारतीय मूल्यों के विपरीत है, ऐसा कहते हुए वरुण काकानी ने सुझाव दिया कि पूर्वजो ने जिस कल्याणकारी समाज की नींव रखी थी, उसे आगे बढ़ते हुए हमें समाज के अंतिम व्यक्ति की विचारधारा को भी समझना होगा।
सौ. दीपा करवा ने युवाओं से अधिकार के साथ उत्तरदायित्व की बात कही तथा स्वयं स्वार्थी नहीं बनकर दूसरों की खुशी में स्वयं की खुशी देखनी चाहिए। जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय परिवार में सर्वसम्मति से लेने चाहिए।
श्वेता हेडा ने युवा वर्ग से कहा कि जीवन आपके अकेले का नहीं है, परिवार और समाज की मदद से ही हम किसी मुकाम को हासिल करते हैं। स्वयं को decieplene करके अपने उपलब्ध समय को परिवार एवं समाज के लिए भी देने की भावना जागृत करें, जिस मिट्टी में जन्म लिया, उसका कर्ज उतारना भी अपना फर्ज बनता है।
दर्शन बंग ने कहा की हर व्यक्ति को एक दूसरे के सहयोग की आवश्यकता होती है, स्वकेंद्रित होकर हम अहंकार की ओर बढऩे लगते हैं। पृथ्वी यह सोच ले कि मुझे सौरमंडल की क्या आवश्यकता है, तो उसकी भी गति रुक जाएगी। इस प्रकार युवा वर्ग को भी बेहतर जीवन जीने के लिए दूसरों को भी बेहतर बनाने की और बढऩा चाहिए। अपनी सफलता के लिए सबका आभार मानना चाहिए।
अभिप्राय/निवारण
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अपने समाज में आखिर यह परिस्थितियां क्यों बनती जा रही है? इसके लिए जिम्मेदार कौन? हमे आगे क्या करना चाहिए....!
सबसे अधिक वह युवा जिम्मेदार है, जो कर्तव्यों को भुलाकर केवल अपने अधिकार की बात करता है। 
परिवार में सब साथ में भोजन करना, मिल बैठकर चर्चा करने को दिनचर्या एवं आदत में लाना होगा।
बचपन से ही मेरा अपना कहने की बजाय हमारा परिवार इस बात को बढ़ावा देना चाहिए।
बच्चों में सकारात्मक सोच का विकास करना चाहिए कि हमें समय आने पर सब सुविधाएं तथा अधिकार मिलेगा।
युवा वर्ग का आत्मसम्मान और Confidance बनाए रखने का भी बड़ों को ख्याल रखना होगा।
बुजुर्ग  पीढ़ी एवं युवा वर्ग में आपसी समन्वय बना रहे, इसके लिए सामाजिक स्तर पर चर्चा सत्र, संगोष्ठी,  स्नेह मिलन आदि आयोजन होते रहने चाहिए। 
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकार मांगने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? अगर हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह पूर्ण क्षमता से कर पा रहे हैं, तो हमें अधिकार अपने आप मिलते जाएंगे। यह कहने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी कि मेरे जीवन पर मेरा अधिकार है।
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