ब्यावर में वैदिक रीति से म्यूजिकल फेरे

वो शादी का यादगार दिन बना जब ब्यावर निवासी ललिता देवी - ओमप्रकाश काबरा के पौत्र राजेंद्र - इन्दु काबरा के सुपुत्र कार्तिक का विवाह संस्कार वैदिक रीति से विधिवत हुआ। सुबह सुर्य ने अपनी रोशनी चारों और बिखेर दी थी काबरा परिवार बारात सुर्य महल से लेकर होटल राज महल पहुंचे बारातियों का स्नेह, उत्साह से स्वागत, सत्कार हुआ और अंतराष्ट्रीय राम, कृष्ण कथा वाचक, भजन सम्राट आर्य जगत के विद्वान आचार्य कुलदीप जी आर्य वैदिक विवाह संस्कार करवाने के लिए मेरठ उत्तर प्रदेश से पधारे। उन्होंने बताया पहले चाहे भगवान राम-सीता, कृष्ण-रूखमणी का विवाह आदि सभी वैदिक मंत्रों से अग्नि के साक्षात दिन में ही होते थे, वर कार्तिक वधु अपूर्वा परिवार के साथ भव्य स्टेज पर बनी चवरी जिसे विशेष रूप से बहुत सुन्दर सजाया गया था, वर-वधु फेरे के स्थान पर आए और आचार्य श्री ने म्यूजिकल वैदिक मंत्रों से विवाह संस्कार करवाया सारा पांडाल देख कर स्तंभ था कि वास्तव में सुर्य के साक्षात फेरे तो ऐसे होते हैं, अग्निहोत्र में वैदिक मंत्रों से आहुतियां के साथ साथ एक एक मंत्रो का अर्थ बताया जा रहा था। वरमाला, सिन्दूर आदि के महत्व को विस्तार से बताया गया। भोजन भी साथ चल रहा था पर सभी मेहमानों का ध्यान म्यूजिकल वैदिक मंत्रों से विवाह संस्कार पर था, ज्यादातर अथिथियों ने अपने जीवन में ऐसे फेरे पहली बार देखे थे,मानव जीवन को उच्च दिव्य महान एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए वैदिक धर्म में 16 संस्कार का विधान है, जिसका वर्णन महर्षि दयानंद सरस्वती ने संस्कार विधि में किया है, वैसे तो सभी संस्कार महत्वपूर्ण है लेकिन विवाह संस्कार सबसे अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सब संस्कारों का आधार है। विवाह संस्कार अपेक्षाकृत लंबा होता है जिसकी प्रक्रियाएं निम्नानुसार है जो की वैदिक मंत्रों के साथ संपादित की जाती है - 
(1) स्वागत - वर जब विवाह हेतु वधू के घर / यज्ञ वेदी पर उपस्थित होता है तब वधू पक्ष के परिवारजनों द्वारा माला जल, आसन एवं मधु पर्क द्वारा वर का स्वागत किया जाता है जल, अन्न का सारभूत तत्व है, वर जल से प्रार्थना करता है कि तुम्हारी शक्ति मेरे अंदर विराजमान रहे ताकि मैं संतान सुख से समृद्ध रहूं। मधु पर्क एक रसायन है जिसमें दही, शहद और गाय का घी तीन-दो-एक के अनुपात में होता है जो की क्रमश: वात, कफ और पित्त को सम अवस्था में रखता है एवं ग्रहणी को भी यह शिक्षा देता है वह ऐसा भोजन बनाएं जो गुण युक्त और रुचिकर हो। 
(2) गोदान - की विधि में वधू के पिता, भाई, ताऊ, चाचा द्वारा अपनी शक्ति के अनुसार वर को गोदनादि द्रव्य अर्पित किया जाता है ताकि इसके दुग्धादि पदार्थों का सेवन कर घर के सभी सदस्य निरोग रह सके। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के विवाह से पूर्व महाराजा दशरथ ने नांदी श्राद्ध करके ब्राह्मणों को गौए प्रदान की थी। विवाह अवसर पर गौ दान का विधान कर ऋषियों मुनियों ने गौ रक्षा का उपाय ढूंढ निकाला था।
(3) कन्यादान की विधि में वधू का पिता/भाई कन्या का दक्षिण हस्त पर वर के दक्षिण हस्त में सोपता है जिसे कन्यादान कहते हैं जो कि वास्तव में कन्या का स्वीकरण है। पिता इस अवसर पर कन्या को कुछ धन देता है जो कि स्त्री धन होता है। कन्या ग्रहण के पश्चात वर वधु को वस्त्र धारण करने के लिए देता है। वर - वधू इसके बाद प्रतिज्ञा मंत्र बोलकर यह कहते हैं कि हम दोनों प्रसन्नतापूर्वक गृह ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश कर रहे हैं और हमारे हृदय को दो जलों के सामान मिल जाए जो कभी पृथक ना हो। इसके बाद वर अपने दक्षिण हाथ से वधू का दक्षिण हाथ पकड़ यज्ञ की महिमा यज्ञ कुण्ड की एक परिक्रमा करता है। परिक्रमा में वधू हमेशा वर के पीछे चलती है और वह भावना व्यक्त करती है कि मैं सदैव आपकी अनुगामिनी रहूंगी।  
(4) यज्ञ (अग्निहोत्र) - सनातन वैदिक धर्मियों के सभी शुभ कार्य अग्नि के साक्षी मानकर किए जाते हैं। इस क्रिया में सामान्य यज्ञ के साथ-साथ राष्ट्र विजय एवं गृह होम शान्ति की आहुतियां भी वैदिक मित्रों से दी जाती है। राष्ट्रभक्ति होम के द्वारा देश के शक्तिशाली एवं समृद्ध होने की कामना की जाती है वही गृह होम में नव दंपति व उसके परिवार के शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक उन्नयन अर्थात सर्वांगीण उन्नति की कामना की जाती है। जया होम के द्वारा हमें जीवन में मध्यम मार्ग अपनाने की प्रेरणा मिलती है ताकि हमारी सदैव जय हो।  
(5) पारिग्रहण संस्कार (विवाह संस्कार) - वर अपने बाएं हाथ में वधू की दाहिनी हाथ ऊपर की और उठता है और अपने दक्षिण हाथ से से वधू की उठाई हुई दक्षिण अजली को हाथ सहित ग्रहण करता है, इसी से विवाह की मूल क्रिया शुरू होती है। वर 6 वैदिक मंत्रों के द्वारा अपने निम्न कर्तव्यों की स्वीकार युक्ति करता है - (1) पत्नी वृद्धावस्था तक सुखपूर्वक मेरे साथ रहेगी जिससे ऐश्वर्य, सुसंतान व सौभाग्य की वृद्धि हो (2) आज से हम दोनों धर्म से पति-पत्नी है व मिलकर गृह कार्यों को सिद्ध करेंगे (3) मैं न्यायपूर्वक धनार्जन कर तेरा भरण पोषण करूंगा। (4) मैं सूर्य की किरणों के समान वस्त्र और आभूषण से तुझे सदा सुशोभित करूंगा व तू भी हमेशा मेरे चित् को प्रसन्न रखना। (5) सभा मंडल में उपस्थित विद्वान व संबंधी मुझे आशीर्वाद प्रदान करें ताकि हम दोनों मिलकर प्रजा को बढ़ावे और प्राकृतिक संसाधनों का सेवन कर निरोगी एवं स्वस्थ रह सके। (6) मैं पदार्थ का चोरी चोरी अकेले कभी भोग नहीं करूंगा और वृद्धावस्था तक गृहस्थ जीवन की बाधाओं को दूर करूंगा। इसके पश्चात वर - वधु अग्नि के साक्षात अपने स्थान पर खड़े हो और वर द्वारा यह कामना की जाती है हम दोनों पर प्रसन्नचित रहकर सो वर्ष तक एक दूसरे को प्रेम से देखते रहे, आनंद से जिए  तथा एक दूसरे के प्रिय वचनों को सुनते रहे । 
(6) शीला - रोहण की विधि में वधू का भाई वधू का दाहिना पांव उठाकर पत्थर की शिला पर चढ़ाता है और वह यह कामना करता है कि तू गृहस्थ धर्म के कार्यों में कोई बाधाए आए तो इस प्रकार दृढ़ रहना जैसे चट्टान मूसलाधार वर्षा और तूफान के थप्पडे खाकर भी दृढ़ रहती है। 
(7) लाजा होम की विधि में वधू अपनी दक्षिण हाथ को वर के दक्षिण हाथ के ऊपर रखती है और वधू का भाई हस्ता जलि में चावल की धाणी और घी डालता है और वैदिक मंत्रों से आहुतियां देते हुए यज्ञ कुंड की चार परिक्रमा की जाती है और वधू परमात्मा से पित्त कुल में स्थिर रहने, कुटुंब की समृद्धि, पति की दीर्घायु होने की कामना करती है और पति का हाथ पकड़ते समय इसके भायात्व को स्वीकार कर कहता है कि जिससे हम मिलकर गृहस्थ धर्म का पालन कर सकें। 
(8) सप्तपदी विवाह की अंतिम प्रमुख विधि है इस समय वर के उपवस्त्र के साथ वधू की उतरीय वस्त्र भी गांठ बांधी दी जाती है, जिसे गठजोड़ कहते हैं। वर - वधु उठकर यज्ञ वेदी के उत्तर में जाते हैं जहां दोनों उत्तराभिमुख खड़े रहते हैं और वह अपना दक्षिण हाथ वधु के दक्षिण स्कंध पर रखता है फिर दोनों ईशान दिशा में एक-एक पग चलते हैं। वैदिक मन्त्रों के साथ ये क्रिया की जाती है। 
(9) सूर्यदर्शन वैदिक मंत्र के साथ वर वधू सूर्य का अवलोकन कर परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि प्रभो हम आपको 100 वर्ष पर्यंत तक देखें, जिए, बोले और दीनता रहित हो, सूर्य बहुत ऊंचा है अत: हमारे जीवन का धैर्य भी ऊंचा हो, सूर्य समय पर उदय और अस्त होता है अत : हम हमारे सारे कार्य नियमित समय पर करने का संकल्प लेते हैं । 10.हृदयस्पर्श  वर वधु अपने दक्षिण हस्त से एक दूसरे का हृदय स्पर्श करते हैं और एक दूसरे के प्रति यह कामना करते हैं कि हम अंतकरण और आत्मा को हृदय में धारण करते हैं। दोनों का चित दोनों के लिए अनुकूल रहे व एक दूसरे की बात को दोनों ध्यान से सुनें।। 
(11) आशिर्वाद....।। 

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