गोत्र की अह्वेलना मत कीजिये - जुगलकिशोर सोमाणी

मिताक्षरा तथा दायभाग नामक दो प्रसिद्ध सिद्धांत हैं । इनमें से दायभाग विधि बंगाल में तथा मिताक्षरा पंजाब के अतिरिक्त शेष भारत में प्रचलित है । पंजाब में इसमें रूढ़िगत परिवर्तन हो गए हैं । मिताक्षरा विधि के अनुसार रक्तसंबंधियों के दो सामान्य प्रवर्ग हैं :
(१) गोत्रीय अथवा गोत्रज सपिंड
(२) अन्य गोत्रीय अथवा भिन्न गोत्रीय अथवा बंधु
सनातन विधि के मिताक्षरा सिद्धांत के अनुसार रक्त संबंधियों को दो सामान्य प्रवर्गों में विभक्त किया जा सकता है । प्रथम प्रवर्ग को गोत्रीय अर्थात् 'सपिंड गोत्रज' कहा जा सकता है । गोत्रीय अथवा गोत्रज सपिंड वे व्यक्ति हैं जो किसी व्यक्ति से पितृ पक्ष के पूर्वजों अथवा वंशजों की एक अटूट श्रृखंला द्वारा संबंधित हों । वंश परंपरा का बने रहना अत्यावश्यक है । उदाहरणार्थ किसी व्यक्ति के पिता , दादा , परदादा आदि उसके गोत्रज सपिंड या गोत्रीय हैं । इसी प्रकार इसके पुत्र पौत्रादि भी उसके गोत्रीय अथवा गोत्रज सपिंड हैं , या यों कहिए कि गोत्रज सपिंड वे व्यक्ति हैं जिनकी धमनियों में समान रक्त का संचार हो रहा हो ।
रक्त-संबंधियों के दूसरे प्रवर्ग को 'अन्य गोत्रीय' अथवा भिन्न गोत्रज सपिंड या बंधु भी कहते हैं । अन्य गोत्रीय या बंधु वे व्यक्ति हैं जो किसी व्यक्ति से मातृपक्ष द्वारा संबंधित होते हैं । उदाहरण के लिये भानजा अथवा भतीजी का पुत्र बंधु कहलाएगा ।
गोत्रीय से आशय उन व्यक्तियों से है जिनके आपस में पूर्वजों अथवा वंशजों की सीधी पितृ परंपरा द्वारा रक्त संबंध हों । परंतु यह वंश परंपरा किसी भी ओर अनंतता तक नहीं जाती । यहाँ केवल वे ही व्यक्ति गोत्रीय हैं जो समान पूर्वज की सातवीं पीढ़ी के भीतर आते हैं । हिंदू विधि के अनुसार पीढ़ी की गणना करने का जो विशिष्ट तरीका है वह भी भिन्न प्रकार का है । यहाँ व्यक्ति को अथवा उस व्यक्ति को अपने आप को प्रथम पीढ़ी के रूप में गिनना पड़ता है जिसके बारे में हमें यह पता लगाना है कि वह किसी विशेष व्यक्ति का गोत्रीय है अथवा नहीं । उदाहरण के लिये , यदि 'क' वह व्यक्ति है जिसके पूर्वजों की हमें गणना करनी है तो 'क' को एक पीढ़ी अथवा प्रथम पीढ़ी के रूप में गिना जायगा । उसके पिता दूसरी पीढ़ी में तथा उसके दादा तीसरी पीढ़ी में आएँगे और यह क्रम सातवीं पीढ़ी तक चलेगा । ये सभी व्यक्ति 'क' के गोत्रीय होंगे। इसी प्रकार हम पितृवंशानुक्रम में अर्थात् पुत्र , पौत्रादि की सातवीं पीढ़ी तक अर्थात् 'क' के प्रपौत्र के प्रपौत्र तक गणना कर सकते हैं । ये सभी गोत्रज सपिंड हैं परंतु केवल इतने ही गोत्रज सपिंड नहीं हैं । इनके अतिरिक्त सातवीं पीढ़ी तक , जिसकी गणना में प्रथम पीढ़ी के रूप में पिता सम्मिलित हैं , किसी व्यक्ति के पिता के अन्य पुरुष वंशज अर्थात् भाई , भतीजा,, भतीजे के पुत्रादि भी गोत्रज सपिंड हैं । इसी प्रकार किसी व्यक्ति के दादा के छ: पुरुष वंशज और परदादा के पिता के छ: पुरुष वंशज भी गोत्रज सपिंड हैं । हम इन छ: वंशजों की गणना पूर्वजावलि के क्रम में तब तक करते हैं जब तक हम 'क' के परदादा के परदादा के छ: पुरुष वंशजों को इसमें सम्मिलित नहीं कर लेते । इस वंशावली में और गोत्रज सपिंड भी सम्मिलित किए जा सकते हैं , जैसे 'क' की धर्मपत्नी तथा पुत्री और उसका दौहित्र । 'क' के पितृपक्ष के छह वंशजों की धर्मपत्नियाँ अर्थात् उसकी माता , दादी , परदादी और उसके परदादा के परदादा की धर्मपत्नी तक भी गोत्रज सपिंड हैं ।
सम्यक् तथा संकुचित वैधिक निर्वचन के अनुसार गोत्रज सपिंडों की कुल संख्या 57 है । 'क' के समान पूर्वज की 13वीं पीढ़ी तक के इन पूर्वजों के वंशजों के परे जो व्यक्ति होंगे वे 'क' के समानोदक होंगे । इनके अतिरिक्त 'क' के परदादा के परदादा के परे पितृपरंपरा के सात पूर्वज और उस परंपरा में 41वीं पीढ़ी तक के उनके वंशज भी 'क' के समानोदक होंगे । समानोदक वे व्यक्ति हैं जिन्हें 'क' श्राद्ध करते समय जल देता है । परतु व्यापक दृष्टि से समानोदक भी गोत्रीय ही हैं ।
*धर्म गोत्र :* 
हिंदू धर्म में कितने गोत्र होते हैं ? अपने गोत्र का पता कैसे लगाएं ? जानिए यहाँ :
बहुत से लोगों को नहीं पता कि गोत्र क्या होता है और उनका गोत्र क्या है । ऐसे में आज हम विस्तार में जानेंगे कि गोत्र का हिंदू धर्म में क्या महत्व है और इसका कैसे पता लगाया जा सकता है ।
गोत्र: हिन्दू समाज में गोत्र शब्द का अर्थ कुल होता है । एक आम आदमी समाज द्वारा बनाई गई नीतियों और नियमों का पालन करके ही इस समाज में अपना और अपने परिवार का सम्मान बनाए रख सकता है । गोत्र  भी प्राचीन मानव समाजों द्वारा बनाए गए रीति-रिवाजों का हिस्सा है जो यह निर्धारित करते हैं कि कोई व्यक्ति किस पूर्वज की संतान है । एक वंश के सभी वंशज मूल रूप से एक ही पूर्वज से संबंधित होते हैं । गोत्र का महत्व इतना अधिक है कि प्रत्येक पूजा या ऐसे धार्मिक अनुष्ठान में जहाँ संकल्प किया जाता है , पूजा कराने वाले पण्डित जी को यजमान का गोत्र अवश्य पूछना चाहिए । पुराने जमाने के लोग अक्सर उनके गोत्र को जानते थे । आज के लोगों से उनका गोत्र पूछो तो वे आसमान की ओर ताकने लगते हैं । गूगल-युग की यह पीढ़ी या तो धार्मिक कार्यों के प्रति उदासीन हो गई है या इसमें बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है । गोत्र का इतिहास बहुत पुराना है । आमतौर पर यह माना जाता है कि गोत्र का संबंध गौमाता और ऋषि-मुनियों से है । इसमें कहा गया है कि जिन ऋषि के पूर्वज शिष्य थे , उनके नाम से कुल का गोत्र सदियों तक चला । जिन ऋषि के पास जिस नस्ल की गौमाता होती थी , उन्ही के नाम का गोत्र बना ।
जिनका गोत्र ज्ञात नहीं है उनके लिए ज्योतिषी कश्यप गोत्र बनाकर जाते हैं।
*गोत्र क्या है ?*
गोत्र आपके वंश के बारे में बताता है । जो वंश जिस नस्ल की गौमाता का दुग्धपान करता था यानि जिन ऋषि मुनी के सानिध्य में रहा - वही गोत्र बना । 
जाति , धर्म , गोत्र , वर्ण ये सभी चीजें मनुष्य ने बनाई है और हर चीज को किसी खास मकसद के लिए बनाया गया है , ये सभी चीजें हजारों-लाखों साल पहले बनाई गई थी , जिनका हम आज भी पालन कर रहे हैं । इसका पालन करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि हम अपने स्तर पर सम्मानपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकें और अपने पूर्वजों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी जो हमें विरासत में मिली है , उस स्थान के नियम-कायदों का विस्तार कर सकें ।
आपको पता होगा कि हमारे देश में समाज को चार वर्णों ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र में बांटा गया है । 
जब जाति का विभाजन होता है तो इसके बाद अलग-अलग गोत्रों का निर्माण हुआ , जिसके द्वारा प्रत्येक जाति के लोगों को अलग-अलग भागों में विभाजित किया गया । एक गोत्र के स्त्री-पुरुष आपस में विवाह नहीं कर सकते क्योंकि एक गोत्र में आने वाले सभी लोग भाई-बहन कहलाते हैं ।
*मुख्य कुल कौन से हैं ?* 
मुख्य गोत्रों की बात करें तो 7 गोत्र हैं जो सात ऋषियों के नामों पर आधारित हैं :
   • *अत्री*
   • *भारद्वाज*
   • *भृगु*
   • *गौतम*
   • *कश्यप*
   • *वशिष्ठ*
   • *विश्वामित्र*
इसी तरह शिष्य परम्परा में गोत्र बनते-बढते गये । 
*गोत्र मुख्य रूप से विवाह में प्रयोग किया जाता है । हिन्दू धर्म में विवाह निश्चित होने पर दोनों पक्ष एक दूसरे का गोत्र जानते हैं , यदि दोनों का गोत्र समान हो तो विवाह निश्चित नहीं होता । माना जाता है कि यदि उनका गोत्र एक है तो वे एक ही गोत्र के होते हैं , ऐसे में उनके बीच खून का रिश्ता होता है । इस कारण से शादी नहीं हो पाती है ।*
*सभी वर्ग कैसे हैं ?*
जैसा कि आप जानते होंगे कि वर्ण चार प्रकार के होते हैं  :
*ब्राह्मण वर्ण*
इस वर्ण को उच्च वर्ण माना जाता है । इनका कार्य पठन-पाठन , पाण्डित्य , पूजा करना , हवन करना , उपदेश , दिशा-निर्देश और विवाह आदि कराना  और इनके सभी कार्य धर्म और संस्कृति से संबंधित हैं ।
*क्षत्रिय वर्ण*
इस वर्ण में राजपूत आदि समाज आते हैं । इस वर्ण का कार्य राजनीतिक व्यवस्था को संभालना तथा अपने क्षेत्र के लोगों की शत्रुओं से रक्षा करना है । यह वर्ग राजाओं और सम्राटों के लिए बनाया गया है । जनता इनके सानिध्य में भय मुक्त रहती है । 
*वैश्य वर्ण*
इस वर्ण के लोगों का कार्य आय-व्यय , खेती , व्यापार , उद्योग , हिसाब-किताब रखना और उसकी जानकारी रखना है । साधारणतया इस वर्ण में वणिक वर्ग के लोग होते हैं । 
*शूद्र वर्ण*
 इस वर्ण के लोग अपने राज्य के लिए गुप्तचरों का काम करते थे और राज्य के लोगों की सेवा का काम करते थे ।
इस प्रकार चार वर्ण बनाए गए हैं , इन वर्णों में अनेक जातियाँ हैं । इन सभी जातियों को उनके कर्मों के आधार पर इन वर्णों में विभाजित किया गया है ।
*अपना गोत्र कैसे प्राप्त करें या जानें ?*
किसी भी व्यक्ति का गोत्र उसके पूर्वजों से संबंधित होता है । आपके पूर्वज किस ऋषि से जुड़े हैं , उसी वंश परंपरा के तहत आपका गोत्र निकलेगा । ऐसे में आप अपनी वंशावली में अपना गोत्र देख सकते हैं । सबसे आसान तरीका है कि आप अपने घर के बड़ों से अपने गोत्र के बारे में पूछें । इसके बारे में अपने दादा या परदादा या अपने पिता से सीखें । तीर्थों के पुरोहितों की बहियों से जानें । अपने जागाओं (भाट) की बहियों से जानें । 
कुछ लोग इंटरनेट के माध्यम से गोत्र खोजने की कोशिश करते हैं । कई साइट्स भी इसे बताने का दावा करती हैं , लेकिन यह सब सही नहीं हो सकता । दूसरा कोई हो ही नहीं सकता जो आपको आपका गोत्र बता सके ।  
बस इतना जान लीजिए कि आपके कुल का नाम इन्हीं आठ ऋषियों में से किसी एक के नाम पर पड़ा है या इनके शिष्यों की परम्परा से पड़ा है । अब ऐसी स्थिति में आपको बस इतना करना है कि किसी पण्डितजी या तीर्थपुरोहित या जागा को अपनी वंशावली पुस्तिका दिखानी है , वहीं से आप इसके बारे में पता कर सकते हैं ।

संकलनकर्ता 
जुगलकिशोर सोमाणी
प्रदेशाध्यक्ष , पूर्वोत्तर राजस्थान प्रादेशिक माहेश्वरी सभा
"शांति कुञ्ज"
बी - 94 , आर्यनगर विस्तार ,
मुरलीपुरा ,
जयपुर 302 039 ( राजस्थान )
मोबाइल 093145 21649 ; 094140 11649
Mail id :  jksomanijaipur@gmail.com

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