संस्कार और सृजनशीलता का प्रतीक बनीं दिव्या नवाल, जलगाँव


आज की युवा पीढ़ी नवचेतना और नवाचार के साथ हर क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित कर रही है। कोई आध्यात्म में रुचि रखता है, कोई पूजा-पाठ में, तो कोई सामाजिक कार्यों में अपना योगदान देता है। वहीं कुछ लोग अपने शौक को भी प्रभु चरणों में अर्पित कर देते हैं।

ऐसा ही प्रेरणादायक उदाहरण हमारी बहुरानी, बिटिया दिव्या ने प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपने पेंटिंग और एंब्रायडरी के शौक को कला प्रदर्शन के रूप में श्रीहरि के चरणों में समर्पित किया। संस्कृति और संस्कारों का संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है, और यही भारतीय संस्कृति हमें विश्व में विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

बीते फरवरी माह में हमारे पुत्र का विवाह हुआ और मराठवाड़ा (लातुर) की बिटिया दिव्या ने बहू बनकर खानदेश (जलगाँव) स्थित नवाल परिवार के घर-आँगन में खुशियों के रंग बिखेर दिए।

दिव्या ने लातुर स्थित प्राचीन सिद्ध बालाजी मंदिर के सिंहासन पट की सजावट हेतु लगभग 9 महीनों तक निरंतर परिश्रम किया। इस कार्य में उनकी माताजी, बहनों और भाभियों का भी सराहनीय सहयोग रहा। आज के डिजिटल युग में इतनी तल्लीनता से हस्तकला में समय देना वास्तव में आश्चर्यजनक और प्रेरणादायक है। उन्होंने 8म10 फीट के पीले बंगलुरू सिल्क कपड़े पर एंब्रायडरी और पेंटिंग के माध्यम से श्रीहरि के नामों को अंकित किया। लगभग 5 किलो रंग-बिरंगे मोतियों (पिंक, गोल्डन, सिल्वर, लाल) और 1 किलो चमकीले सितारों से सिंहासन पट को भव्य रूप प्रदान किया।


इस कलाकृति में धार्मिक प्रतीकों का अत्यंत सुंदर समावेश किया गया है — जैसे तिलक (नामाम), जो सफेद चंदन और कस्तूरी से निर्मित होता है, भगवान बालाजी के तेज का प्रतीक है। बीच की लाल रेखा माता लक्ष्मी का प्रतीक है, जो प्रभु के हृदय में उनके वास को दर्शाती है। कमल पुष्प, सुदर्शन चक्र और शंख जैसे प्रतीकों को भी अत्यंत सुंदरता से उकेरा गया है, जो हमारे जीवन में सकारात्मकता, ऊर्जा और आध्यात्मिकता का संदेश देते हैं। इस नयनाभिराम सिंहासन पट के दर्शन मात्र से सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। हम नवाल परिवार स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली मानते हैं कि हमारी बहुएँ शिक्षा, संस्कार और संस्कृति से इतनी गहराई से जुड़ी हुई हैं।

हमारी बहुरानी बिटिया सौ. दिव्या को इस उत्कृष्ट रचनात्मक प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई एवं अशेष आशीर्वाद। हमें विश्वास है कि वह इसी प्रकार अपनी सृजनशीलता से हमारी संस्कृति को और भी समृद्ध करती रहेंगी।

सौ. सविता सुशील नवाल, जलगाँव (महाराष्ट्र) 


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