| अब शादी एक संस्कार नहीं सोशल इवेंट बन गया है - कुम कुम काबरा |
|
|
भारतीय समाज में विवाह एक युगों से स्थापित पवित्र परंपरा रहा है, जिसे केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं बल्कि दो परिवारों और समुदायों के बीच भी एक मजबूत सामाजिक सेतु के रूप में देखा जाता रहा है । यह एक मात्र सामाजिक अनुबंध नहीं था बल्कि सात फेरे, सात वचन, और सात जन्मों तक साथ निभाने की सांस्कृतिक अवधारणा में गूंथा हुआ एक भावनात्मक दायित्व था । हमारे बुजुर्ग जैसे दादा- दादी नाना - नानी कहते थे कि जोडियाँ तो भगवान के घर से बन कर आती है । लेकिन बीते कुछ वर्षों में हमने महसूस किया है कि यह संस्कार अब धीरे-धीरे एक भव्य सामाजिक तमाशों में परिवर्तन हो गया है । आधुनिकता की आड़ में विवाह अब एक परफॉर्मेंस बनता जा रहा है जिसमें अभिनय करना, सजे धजे दिखाना और कैमरे पर मुस्कराना रिश्तों की गहराई से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है । विवाह एक निजी भावनाओं का उत्सव नहीं बल्कि सार्वजनिक प्रदर्शन की वस्तु है । एक ऐसा मंच, जहां रिश्ते कम और रोशनी ज्यादा होती है । पंडित जी की आवाज पीछे छूट जाती है, और डीजे की धुन प्रधान हो जाती है । यह परिवर्तन केवल जीवन शैली की दिशा में नहीं,बल्कि मूल जीवन दृष्टि में आया है -जहां स्थायित्व की जगह क्षणिक आकर्षण ने ले ली हैं। हम शायद यह भूल चुके हैं कि रिश्तो की गरिमा बाजार की चमक में नहीं ,आत्मीयता की सादगी में बसती है । विवाह अब एक रिश्ता नहीं, एक इवेंट है और यही सबसे बड़ा खतरा है । शादी अब भावनाओं का नहीं पैसों का खेल बनता जा रहा है । इस चकाचौंध भरे बाजार की असली कीमत कौन चुका रहा है ? वे मां-बाप जो बेटी की शादी में प्रतिष्ठा की रक्षा के नाम पर जीवन भर की जमा पूंजी लुटा देते हैं । वे नव विवाहित जो भव्यता की आड़ में कर्ज से जिंदगी की शुरुआत करते हैं । वे मेहमान जो भोजन की विविधताओं का विशलेषण करते हुए यह भूल जाते हैं कि शादी का केन्द्र बिन्दु दो इंसानो का मिलन होता है। शादियाँ अब भावनाओं की नहीं "पैकेजिंग" की प्रतियोगिता बन गई है ।डेस्टिनेशन ,वेडिंग, डीजे, टेंट, रिसॉर्ट, ब्यूटी पार्लर, वेटस ,हल्दी ,मेहंदी यह सब अब आवश्यक अंग माने जाते है। हल्दी मंहदी को इस तरह से मनाना अपने संस्कार में नही है । विडंबना यह है कि जिन शादियों पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं उसमें कई रिश्ते चंद दिनो मे,महीनो,या वर्षों में बिखर जाते हैं । विवाह के पवित्र बंधन को हमने किस तरह से भव्य आयोजन मे बदल दिया है । इनके मूल उद्देश्यों को ही धुंधला कर दिया है । जब विवाह एक फोटोजेनिक समारोह बन जाता है तब उसमें एक सहनशीलता, शर्म, समझदारी और संवाद जैसी भावनाएं धीरे-धीरे अनुपस्थित होती जाती है । कई बार यह देखा गया है कि शादी की तैयारियों में महीनों लगाने वाले दंपति, विवाहोपरांत संवादहीनता और असमंजस के शिकार हो जाते हैं व उनकी पूरी ऊर्जा समारोह की भव्यता में लग चुकी होती है । यह एक प्रकार का विडंबनात्मक दृश्य है जिस रिश्ते की शुरुआत पर सैकड़ो लोग ताली बजा रहे थे वही रिश्ता बाद में चुपचाप किसी कोर्ट की फाइल में बदलाब हो जाता है । इसके टूटने में न कोई बराती होता है न संगीत, न समाज सिर्फ दो लोग होते हैं और उनके साथ ढहता हुआ एक झूठा सपना । क्या हम विवाह को फिर से उसकी गरिमा और भावात्मक गहराई में नहीं ला सकते ? समाधान आसान नहीं पर असंभव भी नहीं । समाज का चरित्र तभी बदलता है जब सोच बदलती है और सोच तब बदलती है जब कोई साहसिक शुरुआत करता है आज भी देश में अनेक युवा ऐसे उदाहरण पेश कर रहे है । जिन्होंने सादगीपूर्ण विवाह को चुना ,खर्च की जगह संबंधों को प्राथमिकता दी और समारोह की जगह संवेदना को स्थान दिया । अगर समाज के कर्णधार, युवा पीढ़ी और जिम्मेवार लोग आगे आयें तब युवा वर्ग का मार्गदर्शन हो सकता है तभी हमारे परम्परा व संस्कार की रक्षा हो सकेगी ॥ कुम कुम काबरा बरेली (उत्तर प्रदेश) मौ० न० -7017805455 |
|
| 20 February 2026 |
| अब शादी एक संस्कार नहीं सोशल इवेंट बन गया है - कुम कुम काबरा |